आर्थिक तंगी, बेरोजगारी या कर्ज का हवाला देकर पत्नी को भरण-पोषण देने से पति नहीं बच सकता: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

  • आर्थिक तंगी, बेरोजगारी या कर्ज का हवाला देकर पत्नी को भरण-पोषण देने से पति नहीं बच सकता: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

    हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि पति की आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, खराब कारोबार या कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी पत्नी को भरण-पोषण देने के दायित्व से बचने का आधार नहीं बन सकती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तलाकशुदा पत्नी भी दोबारा शादी न करने तक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की हकदार है।

    जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि पति यह दलील देकर भरण-पोषण देने से नहीं बच सकता कि उसके पास भुगतान करने के पर्याप्त साधन नहीं हैं। पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को पति की आर्थिक परेशानियों के कारण खत्म नहीं किया जा सकता।

    क्या है मामला?

    सावित्री देवी की शादी 1997 में सुरजीत से हुई थी और उनके तीन बच्चे हैं। महिला ने आरोप लगाया कि उसे शारीरिक और मानसिक क्रूरता का सामना करना पड़ा और 2009 में उसे वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

    इसके बाद उसने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की। उसका कहना था कि उसके पास अपनी आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है।

    हमीरपुर की पारिवारिक अदालत ने पति की मासिक आय ₹11,250 मानते हुए सावित्री देवी को ₹4,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।

    बाद में 2021 में दोनों का तलाक हो गया। पति ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि तलाक के बाद पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं है और उसकी अपनी आर्थिक स्थिति भी खराब है।

    हाईकोर्ट ने क्या कहा?

    हाईकोर्ट ने पति की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ तलाक हो जाने से पत्नी का भरण-पोषण पाने का अधिकार समाप्त नहीं होता। जब तक तलाकशुदा पत्नी दोबारा शादी नहीं करती, वह धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांग सकती है।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी की आय को लेकर केवल अनुमान, अटकल या धारणा के आधार पर भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता। पति पत्नी की पर्याप्त आय साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेरोजगारी, खराब कारोबार, कर्ज की अदायगी या अन्य आर्थिक परेशानियां पति के लिए भरण-पोषण के दायित्व से बचने का रास्ता नहीं हो सकतीं।

    ₹4,000 का भरण-पोषण बरकरार

    हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत द्वारा तय ₹4,000 प्रति माह भरण-पोषण को उचित और न्यायसंगत माना। कोर्ट ने पति की कमाई की क्षमता और पत्नी की उचित जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आदेश को बरकरार रखा।

    अंततः हाईकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और उसे चार सप्ताह के भीतर भरण-पोषण की राशि पत्नी को देने का निर्देश दिया। हालांकि, अन्य कार्यवाहियों में पत्नी को मिली किसी राशि का इसमें समायोजन किया जा सकेगा।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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