बच्चे को सार्वजनिक रूप से 'चोर' कहना और जेल की धमकी देना प्रथमदृष्टया मानसिक पीड़ा पहुंचा सकता है: हिमाचल हाईकोर्ट

Praveen Mishra

8 July 2026 4:43 PM IST

  • बच्चे को सार्वजनिक रूप से चोर कहना और जेल की धमकी देना प्रथमदृष्टया मानसिक पीड़ा पहुंचा सकता है: हिमाचल हाईकोर्ट

    हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट की रिपोर्ट में मानसिक आघात (Trauma) के संकेत न मिलने मात्र से किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 75 के तहत दर्ज एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे को वास्तव में मानसिक पीड़ा हुई या नहीं, यह मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाएगा।

    जस्टिस राकेश कैन्थला ने यह टिप्पणी एक स्कूल प्रिंसिपल द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर और आरोपपत्र को रद्द करने की मांग की थी।

    मामला परवाणू स्थित आई-जीनियस स्कूल के एक कक्षा सात के छात्र से जुड़ा है। छात्र के पिता ने आरोप लगाया था कि प्रिंसिपल ने पूरी कक्षा के सामने बच्चे को 'चोर' कहा, उसे उम्रकैद और जेल भेजने की धमकी दी, उसके पालन-पोषण पर सवाल उठाए और स्कूल बदलने तक की बात कही। यह भी आरोप था कि बच्चे को स्कूल की गतिविधियों से अलग कर दिया गया और क्लास के व्हाट्सएप ग्रुप से हटा दिया गया।

    प्रिंसिपल ने दलील दी कि मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट में बच्चे में किसी मानसिक आघात के संकेत नहीं मिले, इसलिए धारा 75 के तहत कोई अपराध नहीं बनता।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि किसी बच्चे को सहपाठियों के सामने चोर कहना और जेल भेजने की धमकी देना प्रथमदृष्टया ऐसी हरकत है, जिससे मानसिक पीड़ा हो सकती है। अदालत ने कहा कि मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट अभियोजन के मामले को स्वतः खारिज नहीं करती और मानसिक पीड़ा को मुकदमे के दौरान अन्य साक्ष्यों से भी साबित किया जा सकता है।

    अदालत ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत एफआईआर रद्द करने की कार्यवाही में आरोपों की सत्यता या बचाव पक्ष के साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। चूंकि जांच में संज्ञेय अपराध का प्रथमदृष्टया मामला सामने आया है, इसलिए मामले का परीक्षण ट्रायल कोर्ट में ही होना चाहिए।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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