स्वतंत्रता सुरक्षित करने के लिए असाधारण मामलों में जमानत लेने के लिए रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल किया जा सकता है: केरल हाईकोर्ट

LiveLaw News Network

2 Feb 2024 7:45 AM IST

  • स्वतंत्रता सुरक्षित करने के लिए असाधारण मामलों में जमानत लेने के लिए रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल किया जा सकता है: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने माना कि हालांकि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार सीआरपीसी की धारा 438 या 439 के तहत जमानत के उपाय का विकल्प नहीं है, लेकिन इसे स्वतंत्रता हासिल करने के लिए असाधारण मामलों में लागू किया जा सकता है।

    जस्टिस के बाबू ने कहा,

    संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक याचिका में जमानत की राहत की मांग करते समय, हाईकोर्ट को इस तथ्य के प्रति जागरूक होकर अपनी शक्ति का प्रयोग करना होगा कि याचिकाकर्ता के पास एक वैकल्पिक उपाय है और इस तरह के असाधारण मामलों में एक पक्ष अपनी स्वंतत्रता की सुरक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका में राहत की मांग कर सकता है।”

    पीठ याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से इनकार करने वाले सत्र न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। ऐसा करते समय, सत्र न्यायालय ने जांच एजेंसी को याचिकाकर्ता के खिलाफ POCSO अधिनियम के तहत कुछ प्रावधान लागू करने का सुझाव दिया था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जमानत के उपाय के विकल्प के रूप में उससे संपर्क नहीं किया था। वह अग्रिम जमानत की मांग करने वाले अपने आवेदन में सत्र न्यायालय द्वारा की गई "टिप्पणियों" से भी व्यथित थे।

    संजय दुबे बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (2023) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए, अदालत ने कहा कि सत्र न्यायालय को सीआरपीसी की धारा 439 के तहत जमानत आवेदन पर विचार करते समय केवल इस बात पर विचार करना होगा कि जमानत दी जाए या नहीं।

    कोर्ट ने कहा कि जब जमानत के संबंध में एक सीमित मुद्दे पर सत्र न्यायालय केवल धारा 438 या 439 सीआरपीसी के तहत विचार कर रहा था, तो उसे उससे परे निर्देश या टिप्पणियां नहीं देनी चाहिए।

    कोर्ट ने कहा, “उपरोक्त चर्चा से कानूनी सिद्धांत यह उभरता है कि, जब एक सत्र न्यायालय आरोपी को धारा 439 या 438 के तहत जमानत देने के सीमित प्रश्न से संबंधित होता है तो उसके लिए आरोपी को जमानत देने पर विचार के सवाल से परे जाकर टिप्पणी या निर्देश देना उचित नहीं है।''

    कोर्ट ने कहा कि सत्र न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियां टिकाऊ नहीं थीं।

    साइटेशन: 2024 लाइवलॉ (केर) 84

    केस टाइटल: अब्दुल कबीर पीयू बनाम केरल राज्य

    केस नंबर: WP(CRL.) NO. 1028/2023

    फैसले को पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story