मुस्लिम कानून में संयुक्त परिवार को मान्यता नहीं होते, भाई नाबालिग भाई-बहनों की ज़मीन नहीं बेच सकता: गुवाहाटी हाईकोर्ट

Shahadat

29 Aug 2026 9:11 PM IST

  • मुस्लिम कानून में संयुक्त परिवार को मान्यता नहीं होते, भाई नाबालिग भाई-बहनों की ज़मीन नहीं बेच सकता: गुवाहाटी हाईकोर्ट

    गुवाहाटी हाईकोर्ट ने फिर से कहा कि मुस्लिम कानून के तहत हर वारिस का हिस्सा अलग और स्वतंत्र होता है। इसलिए चार नाबालिग भाई-बहनों का भाई उनका अभिभावक (गार्जियन) बनकर उनकी ज़मीन नहीं बेच सकता, क्योंकि इस कानून में 'प्रतिनिधित्व के सिद्धांत' (थ्योरी ऑफ़ रिप्रेजेंटेशन) या 'संयुक्त परिवार' की अवधारणा को मान्यता नहीं दी गई।

    ऐसा करते हुए कोर्ट ने ज़मीन के एक टुकड़े पर वादी (Plaintiff) के 30-33 साल के कब्ज़े और प्रतिवादियों (Defendants) द्वारा समय-सीमा के भीतर अपना दावा पेश न कर पाने को आधार मानते हुए वादी के अधिकार, मालिकाना हक और हित को पक्का माना। यह तब भी माना गया जब चार नाबालिगों के चार-पांचवें हिस्से के संबंध में बिक्री विलेख (Sale Deed) अमान्य है।

    जस्टिस कल्याण राय सुराना ने कहा:

    "सर दिनशा मुल्ला की 'प्रिंसिपल्स ऑफ़ मोहम्मदन लॉ' (मुस्लिम कानून के सिद्धांत) में ऐसी कोई बात नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि मुस्लिम कानून के तहत संयुक्त परिवार की कोई अवधारणा मौजूद है। फिर भी भरोसे का रिश्ता (Fiduciary Relationship) मौजूद होता है। तेलंगाना हाईकोर्ट ने मो. नसीरुद्दीन अहमद खान (मृतक) बनाम मो. मुज़फ़्फ़रुद्दीन महमूद खान के मामले में कहा है कि... मुस्लिम वारिस 'सह-उत्तराधिकारी' Coparceners) नहीं होते हैं और उन्हें संपत्ति के हर हिस्से में केवल न्यूनतम हिस्से का बचाव करने का अधिकार होता है। दूसरे शब्दों में, संयुक्त परिवार की अवधारणा मुस्लिम कानून के लिए अनजान है। इसके अलावा, मुस्लिम कानून 'प्रतिनिधित्व के सिद्धांत' को मान्यता नहीं देता है। हर वारिस का हित अलग और स्वतंत्र होता है। परिवार के वयस्क पुरुष सदस्यों द्वारा सभी इच्छुक सदस्यों (नाबालिगों और महिलाओं सहित) के लाभ के लिए व्यापार करने में कानून के खिलाफ कुछ भी नहीं है। जब वयस्क पुरुष सदस्य सभी इच्छुक व्यक्तियों की ओर से व्यापार करने के लिए संपत्ति रखता है तो वह उन अन्य व्यक्तियों के साथ भरोसे के रिश्ते में होता है। यदि वाद (Plaint) में साझेदारी, एजेंसी या भरोसे के रिश्ते का मामला बनता है, तो यह तर्क दिया जा सकता है कि एक व्यक्ति के नाम पर खरीदी गई संपत्ति सभी के लाभ के लिए है।"

    यह टिप्पणी अपीलीय अदालत के उस फैसले के खिलाफ अपील में आई, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया गया, जिसमें वादी को विवादित ज़मीन का मालिक घोषित किया गया और खाली कब्ज़ा वापस पाने की अनुमति दी गई। इस अपील को इस अहम सवाल पर स्वीकार किया गया कि 'क्या निचली अपीलीय अदालत ने यह मानकर कानून की गंभीर गलती की थी कि वादी का विवादित ज़मीन पर अधिकार, मालिकाना हक और हित है, जबकि जिस सेल डीड से उसने इसे खरीदा था, वह अमान्य (void) थी?'

    वादी का मामला यह था कि उसने 1975 में नगर अली से एक रजिस्टर्ड सेल डीड के ज़रिए ज़मीन का एक टुकड़ा खरीदा था। नगर अली ने यह डीड खुद के लिए और अपने चार नाबालिग भाई-बहनों के अभिभावक (गार्जियन) के तौर पर की थी। उसने दावा किया कि खरीद की तारीख से ही ज़मीन पर उसका कब्ज़ा रहा है, उसने बटाईदारों (Adhiars) या मज़दूरों के ज़रिए ज़मीन पर खेती की है और विवादित ज़मीन के मामले में उसका नाम सरकारी रिकॉर्ड में भी दर्ज (Mutation) किया गया।

    प्रतिवादियों ने दावा किया कि सेल डीड गैर-कानूनी, धोखाधड़ी वाली और शुरू से ही अमान्य (void ab initio) थी, क्योंकि अली उनका अभिभावक नहीं था और कोई अभिभावक प्रमाण-पत्र (Guardianship Certificate) नहीं लिया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने कभी ज़मीन नहीं बेची, उन्हें मुकदमे में समन मिलने तक रजिस्टर्ड सेल डीड के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और अपने पिता की मृत्यु के बाद से ज़मीन पर उनका ही कब्ज़ा रहा है।

    हाईकोर्ट ने माना कि चार-पांचवें हिस्से (4/5th share) के संबंध में सेल डीड को अमान्य मानने का फैसला मोहम्मडन लॉ (मुस्लिम कानून) की सही समझ पर आधारित था। यह कानून नगर अली को - जो चार नाबालिग भाई-बहनों का बड़ा भाई है - उनका अभिभावक मानकर उनकी ज़मीन को वैध रूप से बेचने की इजाज़त नहीं देता है।

    कोर्ट ने आगे कहा,

    “इसलिए यह देखा जा सकता है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला - जिसे पहली अपीलीय अदालत ने संशोधित किया कि 4/5वें हिस्से के संबंध में सेल डीड अमान्य थी - मोहम्मडन लॉ की सही समझ है। यह कानून याद अली के बेटे नगर अली को - जो अन्य चार नाबालिग भाई-बहनों का बड़ा भाई भी है - उनका अभिभावक मानकर 18.02.1975 की रजिस्टर्ड सेल डीड नंबर 2913/75 के तहत ज़मीन को वैध रूप से बेचने की इजाज़त नहीं देता है।”

    कोर्ट ने आगे कहा कि नगर अली के एक-पांचवें हिस्से (1/5th share) के संबंध में सेल डीड वैध है। कोर्ट ने इस बात पर सहमति जताई कि वादी ने यह साबित किया कि ज़मीन खरीदने के बाद से ही विवादित ज़मीन पर उसका कब्ज़ा था और उसने बटाईदारों के ज़रिए उस पर खेती की थी।

    इसके बाद कोर्ट ने लिमिटेशन एक्ट की धारा 27 का ज़िक्र किया और कहा कि वादी को मुकदमे वाली ज़मीन से बेदखल कर दिया गया और उसने तय समय-सीमा के भीतर कब्ज़ा वापस पाने के लिए मुकदमा दायर किया। कोर्ट ने यह भी माना कि प्रतिवादियों का यह तर्क कि उन्हें सेल डीड (बिक्री विलेख) के बारे में समन मिलने और उसकी सर्टिफाइड कॉपी हासिल करने के बाद ही पता चला, उस पर विश्वास नहीं किया गया; और उनके काउंटर-क्लेम (जवाबी दावे) को समय-सीमा के कारण खारिज कर दिया गया।

    कोर्ट ने कहा,

    “इस प्रकार, दोनों अदालतों ने माना कि प्रतिवादियों का काउंटर-क्लेम समय-सीमा के कारण खारिज होने योग्य है। इसलिए दोनों अदालतों द्वारा मुद्दा संख्या 6 से 11 पर एक जैसा निष्कर्ष गलत या मनमाना नहीं पाया गया।”

    हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि अपीलकर्ता निचली अदालतों द्वारा दलीलों और सबूतों को समझने या उन पर विचार करने में कोई गलती नहीं दिखा पाए।

    आगे कहा गया,

    “अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर पाए हैं कि ट्रायल कोर्ट या पहली अपीलीय अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद दलीलों और सबूतों को समझने में कोई गलती की, या किसी मुद्दे पर उनके निष्कर्ष का कोई हिस्सा गलत या मनमाना था—चाहे वह दलीलों और सबूतों पर विचार न करने के कारण हो या रिकॉर्ड पर मौजूद किसी बाहरी सामग्री को ध्यान में रखने के कारण।”

    कानून के अहम सवाल का जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा,

    “इस प्रकार, इस कोर्ट द्वारा तय किए गए कानून के अहम सवाल का जवाब यह है कि ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत ने यह मानने में कानून की कोई गंभीर गलती नहीं की है कि मुकदमे वाली ज़मीन पर वादी का अधिकार, मालिकाना हक और हित है।”

    इसके बाद दूसरी अपील को खर्चों के साथ खारिज किया गया।

    Case Title: On the Death of Nur Mohammad All His Legal Heirs & Ors. v. Legal Heirs of Late Tarubala Saha & Ors.

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