पीड़िता की उम्र साबित नहीं हुई: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने POCSO के तहत 20 साल की सज़ा रद्द की; रेप के लिए 12 साल की सज़ा सुनाई

  • पीड़िता की उम्र साबित नहीं हुई: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने POCSO के तहत 20 साल की सज़ा रद्द की; रेप के लिए 12 साल की सज़ा सुनाई

    गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO Act की धारा 4 के तहत सज़ा तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक अभियोजन पक्ष यह साबित न कर दे कि पीड़िता की उम्र 18 साल से कम थी, भले ही IPC की धारा 376(1) के तहत रेप का अपराध अलग से साबित हो गया हो।

    जस्टिस माइकल ज़ोथानखुमा और जस्टिस शमीमा जहान की डिवीज़न बेंच ने कहा,

    "हमारा मानना ​​है कि भले ही POCSO Act, 2012 की धारा 4 के तहत सज़ा नहीं दी जा सकती - क्योंकि ट्रायल के दौरान पीड़िता की उम्र 18 साल से कम होना साबित नहीं हो पाया - लेकिन अपीलकर्ता द्वारा पीड़िता के साथ रेप की घटना साबित हो गई।"

    यह टिप्पणी बक्सा के स्पेशल जज (POCSO) के फैसले के खिलाफ CrPC की धारा 374(2) के तहत दायर अपील के दौरान की गई। स्पेशल जज ने अपीलकर्ता को POCSO Act की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया और उसे 20 साल की कठोर कैद और ₹20,000 जुर्माने की सज़ा सुनाई ट्रायल कोर्ट ने IPC की धारा 376(1) के तहत भी आरोप तय किया, लेकिन उस पर कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया।

    अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि अपीलकर्ता ने अक्टूबर 2019 में देओसुंगा नदी के पास पीड़िता के साथ रेप किया। पीड़िता के बयान का समर्थन दो चश्मदीद गवाहों ने किया, जबकि उसकी जांच करने वाले डॉक्टर को हाइमन में फटन मिली और उन्होंने कहा कि 48 घंटों के भीतर पेनिट्रेशन (अंदरूनी प्रवेश) के सबूत थे। रेडियोलॉजिकल जांच रिपोर्ट से पता चला कि पीड़िता की उम्र 14 से 16 साल के बीच थी।

    अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि पीड़िता के बयान में विसंगति थी, क्योंकि उसने एक समय कहा कि वह अपीलकर्ता को जानती है, लेकिन बाद में कहा कि उसने उसे पहले नहीं देखा और वह उसे नहीं जानती थी। यह भी तर्क दिया गया कि जहां उसने अपने बयान में कहा कि वह पानी लेने नदी गई थी, वहीं CrPC की धारा 164 के तहत अपने बयान में उसने कहा कि घटना से पहले वह शौच के लिए गई थी। यह भी तर्क दिया गया कि उसकी उम्र साबित नहीं हुई। हालांकि, प्रतिवादियों ने पीड़िता के बयान, चश्मदीदों के बयानों, मेडिकल सबूतों और ज़ब्ती सूची (seizure list) पर भरोसा किया, जिसमें उसकी जन्म तिथि 1 फरवरी, 2006 बताई गई।

    हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता के सबूतों की पुष्टि चश्मदीदों और मेडिकल सबूतों से होती है।

    कोर्ट ने कहा,

    "हमारी राय में ऊपर दिए गए सबूत साफ तौर पर साबित करते हैं कि अपीलकर्ता ने पीड़िता के साथ रेप किया।"

    पीड़िता के बयानों में अंतर के बारे में कोर्ट ने कहा,

    "हालांकि CrPC की धारा 161 और 164 के तहत दिए गए बयानों और उसकी गवाही में कुछ अंतर है - जैसे कि रेप से पहले उसका शौच के लिए जाना और पानी लाना - लेकिन हम पाते हैं कि अपीलकर्ता द्वारा उसके साथ रेप किए जाने की बात पर वह हमेशा एक जैसी बात कहती रही है।"

    उम्र के सवाल पर, हाई कोर्ट ने गौर किया कि न तो स्कूल सर्टिफिकेट और न ही बर्थ सर्टिफिकेट ट्रायल कोर्ट के सामने पेश किए गए और न ही उन दस्तावेज़ों की कॉपी रिकॉर्ड में मौजूद है।

    हाईकोर्ट ने आगे कहा,

    "हालांकि ज़ब्ती सूची को Ext.5 के तौर पर पेश किया गया, लेकिन अभियोजन पक्ष के गवाहों ने ज़ब्ती सूची की बातों को साबित नहीं किया।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "ज़ब्ती सूची को Ext.5 के तौर पर पेश करने से ही पीड़िता के ज़ब्त किए गए स्कूल/बर्थ सर्टिफिकेट की जानकारी साबित नहीं हो जाती।"

    इसके बाद कोर्ट ने रेडियोलॉजिकल जांच पर विचार किया, जिसमें पीड़िता की उम्र 14 से 16 साल के बीच बताई गई।

    कोर्ट ने कहा,

    "इस तरह डॉक्टर द्वारा बताई गई 14 से 16 साल की उम्र की रेंज में दो साल का फ़ायदा देने के लिए पीड़िता की ज़्यादा से ज़्यादा उम्र की सीमा (16 साल) में दो साल और जोड़ने होंगे। इसलिए हमें यह मानना ​​होगा कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 18 साल थी।"

    नतीजतन, कोर्ट ने कहा,

    "इसलिए POCSO Act 2012 के प्रावधान उस व्यक्ति पर लागू नहीं होंगे, जिसने 18 साल की उम्र पूरी कर ली।"

    साथ ही हाईकोर्ट ने देखा कि IPC की धारा 376(1) के तहत भी आरोप तय किए गए और पाया कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से यह साबित हो गया कि अपीलकर्ता ने रेप किया।

    आगे कहा गया,

    "हमारा मानना ​​है कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सफल रहा है कि अपीलकर्ता ने IPC की धारा 376(1) के तहत दंडनीय अपराध किया।"

    इसके अनुसार, यह मानते हुए कि POCSO Act की धारा 4 के तहत दोषसिद्धि नहीं बनती है, क्योंकि ट्रायल के दौरान पीड़िता की उम्र 18 साल से कम होने का तथ्य साबित नहीं हो पाया, हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को IPC की धारा 376(1) के तहत दोषी ठहराया और उसे 12 साल की कठोर कैद और ₹20,000 जुर्माने की सज़ा सुनाई।

    ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले में उस हद तक बदलाव किया गया और इस बदलाव के साथ अपील खारिज कर दी गई।

    Case Title: Md. Majib Ali v. The State of Assam & Ors.

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