POSH कानून के तहत सुलह के बाद भी नियोक्ता को विभागीय कार्रवाई का अधिकार बना रहता है: गौहाटी हाईकोर्ट

Praveen Mishra

9 Jan 2026 6:09 PM IST

  • POSH कानून के तहत सुलह के बाद भी नियोक्ता को विभागीय कार्रवाई का अधिकार बना रहता है: गौहाटी हाईकोर्ट

    गौहाटी हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ़ जस्टिस अशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी शामिल थे, ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि POSH अधिनियम, 2013 की धारा 10(4) के तहत सुलह (conciliation) हो जाने के बाद केवल आंतरिक शिकायत समिति (ICC) द्वारा आगे की जांच पर रोक लगती है, लेकिन इससे नियोक्ता को सेवा नियमों के तहत स्वतंत्र विभागीय कार्यवाही शुरू करने से नहीं रोका जा सकता, खासकर जब बाद में नया साक्ष्य सामने आए और कार्यस्थल की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक हो।

    मामले की पृष्ठभूमि

    मामले में कर्मचारी भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (Airports Authority of India) का एक वरिष्ठ अधिकारी था, जबकि शिकायतकर्ता उसके अधीन काम करने वाली एक महिला अधिकारी थी। महिला अधिकारी ने उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई, जिसे ICC के समक्ष रखा गया। ICC की कार्यवाही के दौरान कार्यस्थल पर तनाव को देखते हुए दोनों पक्षों ने सुलह का विकल्प चुना और सहमति बनी कि वे एक-दूसरे के निकट काम नहीं करेंगे। मानसिक तनाव के कारण शिकायतकर्ता ने पूर्ण जांच पर जोर नहीं दिया।

    ICC ने यह भी दर्ज किया कि पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं, जिस पर शिकायतकर्ता ने आपत्ति जताई और कर्मचारी द्वारा भेजे गए एक आपत्तिजनक संदेश का स्क्रीनशॉट पेश किया। मामला दोबारा ICC को भेजा गया, लेकिन ICC ने यह कहते हुए आगे की कार्यवाही से इनकार कर दिया कि धारा 10(4) के तहत सुलह के बाद कोई जांच नहीं हो सकती।

    इसके बाद नियोक्ता ने नए साक्ष्य के आधार पर कर्मचारी के खिलाफ स्वतंत्र विभागीय कार्यवाही शुरू की। कर्मचारी ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकल पीठ ने विभागीय कार्यवाही को रद्द कर दिया और ICC की “साक्ष्य नहीं हैं” वाली टिप्पणी भी हटाने का आदेश दिया।

    इस फैसले से असंतुष्ट होकर एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने डिवीजन बेंच में अपील की।

    पक्षों की दलीलें

    एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ने कहा कि एकल पीठ ने रिट क्षेत्राधिकार की सीमा से बाहर जाकर ICC के तथ्यात्मक निष्कर्षों में हस्तक्षेप किया। साथ ही, सुलह के बाद नया साक्ष्य सामने आया था, जिससे विभागीय कार्यवाही आवश्यक हो गई।

    दूसरी ओर, कर्मचारी ने तर्क दिया कि सुलह के बाद ICC की कार्यवाही अंतिम हो गई थी और एकल पीठ द्वारा विभागीय कार्यवाही रद्द करना सही था।

    अदालत की टिप्पणियां और निर्णय

    डिवीजन बेंच ने कहा कि POSH अधिनियम एक न्यूनतम संरक्षण देने वाला कानून है और ICC की कार्यवाही नियोक्ता की अनुशासनात्मक शक्ति का स्थानापन्न नहीं बन सकती, जब तक सेवा नियम ऐसा न कहें। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 10(4) केवल ICC को सुलह के बाद आगे जांच करने से रोकती है, नियोक्ता की स्वतंत्र विभागीय शक्ति पर यह रोक लागू नहीं होती। इसके विपरीत, कानून नियोक्ता पर सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करने का दायित्व डालता है।

    अदालत ने कहा कि यदि धारा 10(4) को नियोक्ता की सभी कार्रवाइयों पर रोक के रूप में पढ़ा जाए तो यह कानून के उद्देश्य—कार्यस्थल की सुरक्षा—को ही विफल कर देगा। इसलिए, एकल पीठ द्वारा विभागीय कार्यवाही रद्द करने वाला हिस्सा कानूनसम्मत नहीं था और उसे रद्द कर दिया गया।

    डिवीजन बेंच ने नियोक्ता द्वारा शुरू की गई विभागीय कार्यवाही को वैध ठहराते हुए उसे जिस चरण पर रोकी गई थी, वहीं से फिर शुरू करने का निर्देश दिया।

    इन टिप्पणियों के साथ, एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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