'विध्वंस पहली नज़र में गैर-कानूनी': बिना सुनवाई के घर गिराने पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकारा
Shahadat
9 Sept 2026 7:52 PM IST

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सोमवार (7 सितंबर) को गोलपारा में कई निवासियों के निजी ज़मीन पर बने घरों को बिना उनकी बात सुने गिराने के लिए राज्य के अधिकारियों को फटकार लगाई। कोर्ट ने माना कि यह कार्रवाई पहली नज़र में गैर-कानूनी और बिना अधिकार के की गई।
ऐसा करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा कि याचिकाकर्ताओं के घरों को गिराने की ज़रूरत क्यों पड़ी और क्या कोई "तत्काल खतरा" है।
कोर्ट उन लोगों की याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिन्होंने मटिया के सर्कल ऑफिस (प्रतिवादी नंबर 3) द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी। इस नोटिस में याचिकाकर्ताओं को "धमकी" दी गई कि अगर उनकी अपनी कृषि भूमि पर बने घरों को 24 घंटे के भीतर नहीं गिराया गया तो उनके खिलाफ़ 'असम भूमि और राजस्व विनियमन, 1886' के तहत बने 'सेटलमेंट नियमों' के नियम 6 और 'आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005' की धारा 30(2)(v) और 34(k) के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट एस. बोरठाकुर ने बताया कि नोटिस 5 सितंबर को जारी किए गए थे और 7 सितंबर की सुबह-सुबह ही याचिकाकर्ताओं के घरों को गिरा दिया गया, जबकि उन्हें अपनी बात रखने का कोई मौका नहीं दिया गया।
इन दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस देवाशीष बरुआ की सिंगल जज बेंच ने कहा:
"इस कोर्ट की राय में प्रतिवादी नंबर 3 (सर्कल ऑफिसर) की कार्रवाई पहली नज़र में गैर-कानूनी और बिना अधिकार के लगती है। यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' का उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का एक हिस्सा है। आज के समय में, जब कई स्थापित सिद्धांत मौजूद हैं, यह सोचना भी मुश्किल है कि याचिकाकर्ताओं को बिना मौका दिए इस तरह के नोटिस जारी किए गए। इसके अलावा, नोटिस में निजी ज़मीन पर इतनी कठोर शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए किसी तत्काल खतरे का ज़िक्र नहीं है।"
कोर्ट ने नोटिसों को देखा और कहा कि यह साफ़ है कि ये नोटिस याचिकाकर्ताओं की पट्टा ज़मीन से संबंधित हैं। अदालत ने यह भी कहा कि असम एग्रीकल्चरल लैंड (रेगुलेशन ऑफ़ रीक्लासिफिकेशन एंड ट्रांसफर फॉर नॉन-एग्रीकल्चरल पर्पस) एक्ट, 2015 की धारा 3(iv) साफ़ तौर पर कहती है कि अगर एक बीघा से कम ज़मीन का इस्तेमाल या ट्रांसफर अपना घर बनाने के लिए किया जा रहा है और घर दो मंज़िला से ज़्यादा ऊंचा नहीं है तो धारा 3 के तहत डिप्टी कमिश्नर से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं है।
इसलिए अदालत ने कहा:
"प्रतिवादी नंबर 2 और 3 की ओर से पेश हुए सरकारी वकील को निर्देश दिया जाता है कि वे अगली तारीख पर अदालत को ज़रूर बताएं कि ऐसा कौन सा तुरंत खतरा था जिसके कारण याचिकाकर्ताओं के घरों को गिराने की कार्रवाई करनी पड़ी... अदालत यह भी निर्देश देती है कि अगली सुनवाई की तारीख तक प्रतिवादी नंबर 2 और 3 याचिकाकर्ताओं की ज़मीन पर कोई और कार्रवाई न करें"।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को इस बीच अतिरिक्त हलफ़नामा (Affidavit) दाखिल करने की भी छूट दी, ताकि वे घर गिराए जाने और उससे हुए नुकसान की जानकारी रिकॉर्ड पर ला सकें।
मामले की सुनवाई 11 सितंबर को होगी।
Case Title: Jahidul Islam & 20 Ors. v. The State of Assam & 2 Ors.


