एक ही FIR से जुड़ी अगली ज़मानत अर्जियों की सुनवाई आम तौर पर उसी जज को करनी चाहिए, जिसने पिछली ज़मानत अर्जी खारिज की थी: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

16 March 2026 6:25 PM IST

  • एक ही FIR से जुड़ी अगली ज़मानत अर्जियों की सुनवाई आम तौर पर उसी जज को करनी चाहिए, जिसने पिछली ज़मानत अर्जी खारिज की थी: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को यह टिप्पणी की कि एक ही FIR से जुड़ी अगली ज़मानत अर्जियों को आम तौर पर उसी जज के सामने लिस्ट किया जाना चाहिए, जिसने पिछली ज़मानत अर्जी खारिज की थी, ताकि आपस में टकराने वाले या असंगत आदेशों से बचा जा सके।

    जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा,

    "इस कोर्ट की रजिस्ट्री माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार काम करने के लिए बाध्य है। कानून की उपरोक्त स्थिति का पालन करते हुए ही, एक ही FIR से जुड़े मामले—खास तौर पर ज़मानत मांगने वाली अर्जियां, चाहे वे अग्रिम ज़मानत के लिए हों या नियमित ज़मानत के लिए—आम तौर पर उसी बेंच/जज के सामने लिस्ट किए जाते हैं, जिसने पहले आरोपी की पिछली ज़मानत अर्जी पर फैसला सुनाया और जो अभी भी आपराधिक मामलों की सुनवाई (क्रिमिनल रोस्टर) का काम देख रहा है।"

    कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की, जब वह भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 80(2), 85 और 3(5) के तहत दर्ज FIR के संबंध में आरोपी द्वारा दायर नियमित ज़मानत अर्जी पर सुनवाई कर रहा था।

    शुरुआत में ही आरोपी के वकील ने कोर्ट को बताया कि आरोपी द्वारा पहले दायर की गई अग्रिम ज़मानत अर्जी को उसी बेंच ने 31 अक्टूबर, 2025 को मामले के गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दिया था।

    इसलिए वकील ने अनुरोध किया कि नियमित ज़मानत अर्जी को किसी दूसरी बेंच के सामने पेश किया जाए। वकील ने यह तर्क दिया कि चूंकि कोर्ट पहले ही आरोपों के गुण-दोष के आधार पर अपना नज़रिया तय कर चुका है, इसलिए हो सकता है कि अब वह ज़मानत देने के पक्ष में न हो।

    राज्य सरकार ने इस अनुरोध का विरोध करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (नज़ीरों) के अनुसार, अगली ज़मानत अर्जियों को आम तौर पर उसी जज के सामने लिस्ट किया जाना चाहिए, जिसने पिछली अर्जी पर सुनवाई की थी।

    अभियोजन पक्ष ने यह तर्क दिया कि इस तरह के मामलों को दूसरी बेंच में भेजने की अनुमति देने से मुकद्दमेबाज़ों को यह बढ़ावा मिलेगा कि वे अपने पक्ष में आदेश पाने की उम्मीद में अलग-अलग बेंचों के सामने जाएं, जिसका न्याय व्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

    सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों का ज़िक्र किया, जिनमें इस बात पर ज़ोर दिया गया कि एक ही FIR से जुड़े मामलों—खास तौर पर ज़मानत अर्जियों—को उसी जज के सामने पेश किया जाना चाहिए ताकि आपस में टकराने वाले आदेशों से बचा जा सके। कोर्ट ने यह भी कहा कि मामलों को लिस्ट करते समय रजिस्ट्री ऐसे निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य है। हालांकि, कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि आरोपी के वकील को लगता है कि इस मामले को किसी दूसरी बेंच के सामने रखा जाना चाहिए – क्योंकि उन्हें लगता है कि वे जस्टिस शर्मा की कोर्ट से ज़मानत हासिल नहीं कर पाएँगे – तो वे कानून के तहत उपलब्ध उचित कानूनी कदम उठाने के लिए स्वतंत्र होंगे।

    कोर्ट ने कहा,

    “फिर भी यदि वकील का यह मत है कि इस मामले को किसी दूसरी बेंच के सामने रखा जाना चाहिए –क्योंकि उनका मानना ​​है कि वे इस कोर्ट से नियमित ज़मानत हासिल नहीं कर पाएंगे (जैसा कि उन्होंने कोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा है, क्योंकि उनकी अग्रिम ज़मानत इस कोर्ट द्वारा पहले ही खारिज की जा चुकी है) – तो वे कानून के तहत अपने लिए उपलब्ध उचित कदम उठा सकते हैं।”

    अब इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए 15 अप्रैल को सूचीबद्ध किया गया।

    Title: DIMPY CHUGH v. STATE (NCT OF DELHI) AND ANR

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