'व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति बहुत कम सम्मान': दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में पुलिस की 'खराब जांच' पर कड़ी टिप्पणी की, जमानत दी
Shahadat
16 Oct 2026 10:01 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या के आरोपी को जमानत देते हुए इस मामले में 'बेहद खराब जांच' करने के लिए दिल्ली पुलिस की आलोचना भी की।
जस्टिस गिरीश कथपालिया ने इस बात पर सवाल उठाया कि अप्राकृतिक मौत की जानकारी मिलने के बावजूद FIR दर्ज करने में देरी क्यों हुई।
कोर्ट ने गौर किया कि स्थानीय पुलिस को घटना की सूचना मिलने के तीन दिन से भी अधिक समय बाद FIR दर्ज की गई, जबकि FIR दर्ज होने के चार घंटे के भीतर ही पूरी जांच पूरी कर ली गई।
कोर्ट ने कहा,
"इससे पता चलता है कि स्थानीय पुलिस ने इस मामले में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति बहुत कम सम्मान दिखाया।"
यह तब हुआ जब जांच अधिकारी से आरोपी की गिरफ्तारी के हालात के बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया तो वह गिरफ्तारी मेमो (Arrest Memo) पेश नहीं कर सका।
कोर्ट आरोपी सचिन की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था। सचिन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दर्ज हत्या के एक मामले में 8 दिसंबर, 2022 से हिरासत में है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, सचिन के मृतक की पत्नी के साथ कथित तौर पर अवैध संबंध थे। आरोप है कि घटना की रात, महिला ने अपने बेटों को घर से बाहर भेज दिया। इसके बाद उसने और सचिन ने मिलकर मृतक को शराब पिलाई और फिर मुक्कों व लातों से पीटकर उसकी हत्या की।
इसके बाद मृतक को अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। अस्पताल ने 4 दिसंबर, 2022 को सुबह करीब 11 बजे 'डेली डायरी एंट्री' के जरिए स्थानीय पुलिस को मौत की सूचना दी। हालांकि, FIR 7 दिसंबर, 2022 को रात 8:15 बजे दर्ज की गई।
कोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज करने में हुई देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया, जबकि पुलिस को यह जानकारी मिल चुकी थी कि मृतक के शव को मुर्दाघर (Mortuary) ले जाया जा रहा है, जो कि एक अप्राकृतिक मौत का मामला है।
कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा 'आखिरी बार साथ देखे जाने' (Last-Seen Circumstance) के तर्क पर भी सवाल उठाए। अदालत ने गौर किया कि गवाह निशांत, जिसने कथित तौर पर मृतक को आखिरी बार आरोपी के साथ देखा था, वह सचिन को नहीं जानता।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि ऐसी स्थिति होने के बावजूद, कोई 'टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड' (शिनाख्त परेड) नहीं कराई गई। साथ ही गवाह ने ट्रायल कोर्ट के सामने अपनी गवाही के दौरान पहली बार आरोपी की पहचान की।
फोरेंसिक सबूतों पर अदालत ने कहा कि अपराध में इस्तेमाल की गई कथित वस्तु (जिससे गला घोंटा गया था) पर मृतक का DNA मिलने से ज्यादा से ज्यादा यह साबित हो सकता है कि उस वस्तु का इस्तेमाल हुआ था, लेकिन इससे सचिन का कोई संबंध नहीं जुड़ता।
अदालत ने यह भी गौर किया कि सभी सार्वजनिक गवाहों से पूछताछ की जा चुकी थी, लेकिन अभियोजन पक्ष के 25 गवाहों में से केवल 10 से ही ट्रायल कोर्ट ने पूछताछ की थी।
यह स्पष्ट करते हुए कि उसका यह आकलन केवल जमानत देने के विचार तक सीमित है, अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट अंतिम चरण में सबूतों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करेगा।
अदालत ने कहा,
"उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए, मुझे आरोपी/आवेदक की स्वतंत्रता को और अधिक सीमित रखने का कोई कारण नहीं दिखता।"
इसके अनुसार, अदालत ने जमानत याचिका मंजूर कर ली और आरोपी को 20,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत (Surety) पर रिहा करने का निर्देश दिया, जो ट्रायल कोर्ट या ड्यूटी मजिस्ट्रेट को संतोषजनक लगे।

