'फोरम कन्वेनियंस' का सिद्धांत CAT के उन नियमों को नहीं बदल सकता, जो अधिकार क्षेत्र तय करने के लिए आवेदक की जगह को प्राथमिकता देते हैं: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
25 Jun 2026 8:00 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें सर्विस से जुड़े विवाद को एर्नाकुलम बेंच से दिल्ली की प्रिंसिपल बेंच में ट्रांसफर करने से इनकार कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि 'फोरम कन्वेनियंस' का सिद्धांत CAT (प्रक्रिया) नियमों के तहत बनी कानूनी व्यवस्था को नहीं बदल सकता, जो आवेदक की पोस्टिंग की जगह को प्राथमिकता देती है।
जस्टिस सी. हरि शंकर और ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीजन बेंच ने कहा कि सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (प्रक्रिया) नियम, 1987 के नियम 6(1) के तहत ओरिजिनल एप्लीकेशन आमतौर पर उस बेंच के सामने दायर की जानी चाहिए जिसके अधिकार क्षेत्र में आवेदक तैनात है या जहां विवाद का कारण (कॉज़ ऑफ़ एक्शन) पैदा हुआ है।
इसलिए प्रतिवादी (Respondents) 'फोरम कन्वेनियंस' के सिद्धांत का इस्तेमाल करके आवेदकों को किसी दूसरी बेंच के सामने मुकदमा लड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा,
"भले ही 'फोरम कन्वेनियंस' के सिद्धांत को लागू किया जाए, अगर आवेदक एक जगह पर हैं और प्रतिवादी दूसरी जगह पर, तो नियम 6 (1) (i) को देखते हुए आमतौर पर सुविधाजनक फोरम वही होगा जहां आवेदक स्थित हैं, न कि वह जहां प्रतिवादी स्थित हैं।"
ट्रिब्यूनल के सामने ओरिजिनल आवेदकों ने याचिकाकर्ताओं के प्रमोशन को चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं (जो मूल रूप से प्रतिवादी थे) ने तर्क दिया कि चूंकि विवादित प्रमोशन ऑर्डर दिल्ली में जारी किया गया और ज़्यादातर प्रतिवादी केरल के बाहर स्थित थे, इसलिए मामले को प्रिंसिपल बेंच में ट्रांसफर किया जाना चाहिए।
उन्होंने 'फोरम कन्वेनियंस' के सिद्धांत का हवाला दिया और तर्क दिया कि ट्रांसफर की अर्जी खारिज करते समय ट्रिब्यूनल ने प्रतिवादियों की सुविधा पर विचार नहीं किया।
इस तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता खुद कई राज्यों में फैले हुए और उनमें से केवल 17 दिल्ली में तैनात थे। ऐसी स्थिति में कोर्ट ने कहा कि तथ्यों के आधार पर भी 'फोरम कन्वेनियंस' का सिद्धांत लागू नहीं होता।
बेंच ने आगे कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 या सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 20 के विपरीत CAT (प्रक्रिया) नियमों का नियम 6(1) ट्रिब्यूनल के सामने प्रतिवादी के बजाय आवेदक की जगह को प्राथमिकता देता है। कोर्ट ने CAT चेयरपर्सन की इस बात से भी सहमति जताई कि मूल आवेदक 'डोमिनस लिटिस' (मुकदमे के मुख्य पक्षकार) होने के नाते, एर्नाकुलम बेंच के सामने कार्यवाही शुरू करने के हकदार थे, क्योंकि इस मामले पर उस बेंच का अधिकार-क्षेत्र था।
बेंच ने आगे कहा कि एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल्स एक्ट की धारा 25 के तहत CAT चेयरपर्सन की एक बेंच से दूसरी बेंच में केस ट्रांसफर करने की शक्ति प्रशासनिक और विवेकाधीन (अपनी मर्जी से फैसला लेने वाली) होती है। अनुच्छेद 226 के तहत दखल तभी जायज़ है जब फैसला गलत सिद्धांतों पर आधारित हो या साफ तौर पर मनमाना या गलत हो।
कोर्ट ने कहा,
"इसके अलावा, हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि टेक्नोलॉजी के आने से देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद पक्षकार वर्चुअल तरीके से कार्यवाही में शामिल हो सकते हैं, भले ही वे शारीरिक रूप से यात्रा करने की स्थिति में न हों।"
यह कहते हुए कोर्ट ने याचिका खारिज की।
Case title: Maheshwar Narayan Sharma And Ors v. M V Babu Svaminath And Ors

