बिना दोषसिद्धि के लंबित आपराधिक मामले, जमानत खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकते: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
22 Oct 2026 4:31 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे लंबित आपराधिक मामलों में, जिनमें अभी तक दोषसिद्धि (कनविक्शन) नहीं हुई, केवल उनके आधार पर जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता—खासकर तब, जब मामले की अन्य परिस्थितियां आरोपी के पक्ष में हों।
जस्टिस सचिन दत्ता ने एक व्यक्ति को जमानत देते समय यह टिप्पणी की। यह व्यक्ति 4 जून, 2025 से न्यायिक हिरासत में था। उस पर मारपीट करने और भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा शस्त्र अधिनियम (Arms Act) के तहत अपराध करने के आरोप हैं।
अदालत ने कहा,
"याचिकाकर्ता का पहले कुछ ऐसे मामलों में शामिल होना, जिनमें दोषसिद्धि (कनविक्शन) नहीं हुई, केवल इसी आधार पर जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता, जबकि मामले की अन्य परिस्थितियां आवेदक के पक्ष में हैं।"
अदालत ने 'प्रभाकर तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया कि कथित अपराध की गंभीरता और कई आपराधिक मामलों का लंबित होना, केवल इसी आधार पर जमानत देने से इनकार करने का कारण नहीं बन सकता।
यह मामला उस घटना से जुड़ा है, जिसमें दिल्ली के नंद नगरी इलाके में एक शराब की दुकान के पास शिकायतकर्ता के साथ चार लोगों ने कथित तौर पर मारपीट की थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, याचिकाकर्ता और एक अन्य व्यक्ति ने शिकायतकर्ता को पकड़ लिया था, जबकि दो अन्य सह-आरोपियों ने उसके साथ मारपीट की। आरोप है कि सह-आरोपियों में से एक ने चाकू का इस्तेमाल करके उसे घायल कर दिया।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसने शिकायतकर्ता को कोई चोट नहीं पहुंचाई। यह भी बताया गया कि मारपीट में इस्तेमाल किया गया कथित चाकू याचिकाकर्ता के पास से नहीं, बल्कि सह-आरोपी की निशानदेही पर बरामद किया गया।
इन तर्कों को स्वीकार करते हुए अदालत ने गौर किया कि याचिकाकर्ता लगभग 16 महीनों से हिरासत में है, जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि आरोप तय (Charges Framed) किए जा चुके हैं और मामला अभी अभियोजन पक्ष के साक्ष्य (Prosecution Evidence) के चरण में है।
अदालत ने कहा कि मुकदमे (ट्रायल) को पूरा होने में समय लग सकता है और याचिकाकर्ता को हिरासत में रखने से जांच के उद्देश्य से अब कोई लाभ नहीं होगा। अदालत ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता की भूमिका, सह-आरोपी (जिसने कथित तौर पर चाकू का इस्तेमाल किया था) की भूमिका से अलग थी।
इस बात पर जोर देते हुए कि दोष सिद्ध होने से पहले हिरासत में रखना, सजा के समान नहीं होना चाहिए, अदालत ने माना कि मौजूदा हालात याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने के लिए उचित हैं।
इसके अनुसार, अदालत ने याचिकाकर्ता को 25,000 रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि की एक जमानत राशि (श्योरिटी) जमा करने पर नियमित जमानत दी।
Case Title : Aniket v. State NCT of Delhi

