अपराध के दौरान 'मूक दर्शक' बने रहना भी अपराध में शामिल होने जैसा: दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार किया
Shahadat
23 Oct 2026 9:45 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या के आरोपी को जमानत देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि कोई भी आरोपी यह कहकर अपनी आपराधिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह केवल एक 'मूक दर्शक' था, खासकर तब जब परिस्थितियां अपराध में उसकी संलिप्तता की ओर इशारा करती हों।
जस्टिस विमल कुमार यादव ने कहा कि मामले की CCTV फुटेज से पता चलता है कि आरोपी की हमलावर (जो उसका बेटा है) के साथ पहले से ही मिलीभगत थी, और बेटे ने अपने पिता की सहमति से ही यह काम किया।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"कई बार, कुछ न करना और केवल एक मूक दर्शक बने रहना भी उतना ही दोषी माना जा सकता है, जितना कि खुद अपराध करना। अगर आप किसी गलत काम को होते हुए चुपचाप देखते रहते हैं, तो आप निष्पक्ष नहीं हैं—बल्कि आप उस अपराध में शामिल हैं।"
कोर्ट भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 34 के तहत दर्ज हत्या के एक मामले में अजीत कुमार द्वारा दायर जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि कुमार ने अपने बेटे को उकसाया, जिसके बाद बेटे ने मृतक पर चाकू से कई वार किए, जिससे उसकी मौत हो गई।
जमानत याचिका का विरोध करते हुए राज्य पक्ष ने CCTV फुटेज का हवाला दिया, जिसमें कथित तौर पर कुमार को अपने घर के बाहर हाथ में फोन लिए खड़े देखा जा सकता है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक को पास देखकर कुमार ने अपने बेटे से कुछ कहा, जिसके बाद बेटा कमरे से चाकू लेकर बाहर आया और मृतक पर हमला कर दिया।
अभियोजन पक्ष ने आगे तर्क दिया कि कुमार ने न तो बीच-बचाव किया और न ही अपने बेटे को मृतक पर हमला करने से रोकने की कोशिश की। उन्होंने यह भी बताया कि कुमार के परिवार की एक लड़की के, मृतक के भतीजे के साथ भाग जाने के कारण दोनों परिवारों के बीच तनाव चल रहा था।
वहीं कुमार के वकील ने दलील दी कि इस घटना में उनकी कोई सक्रिय भूमिका नहीं थी और वे केवल एक दर्शक थे।
यह भी बताया गया कि वे 27 मई, 2024 से हिरासत में हैं और सभी चश्मदीदों से पूछताछ की जा चुकी है, इसलिए अब उन पर किसी तरह के प्रभाव की कोई गुंजाइश नहीं है।
याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने IPC की धारा 34 के सिद्धांतों पर विचार किया। यह धारा उन आपराधिक कृत्यों से संबंधित है, जिन्हें कई लोगों द्वारा एक साझा इरादे (Common Intention) को पूरा करने के लिए अंजाम दिया जाता है।
जस्टिस यादव ने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी सिद्धांतों का लागू होना हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीकी साक्ष्य, जैसे कि सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल फोन, आपराधिक कार्यवाही में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
अदालत ने गौर किया कि घटना स्थल पर आरोपी की मौजूदगी को लेकर कोई विवाद नहीं है। साथ ही सीसीटीवी फुटेज में वह चाकूबाजी शुरू होने से पहले कुछ बुदबुदाता हुआ दिखाई दे रहा है।
अदालत ने कहा,
"इन सभी बातों को मिलाकर देखें तो पता चलता है कि अभियोजन पक्ष ने सही तरीके से IPC की धारा 34 लगाई। आरोपी यह कहकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता कि वह तो बस वहां मौजूद था और कुछ नहीं कर रहा था।"
अदालत ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज की। अदालत ने कहा कि इस चरण में उसे इस आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती कि वह मुख्य हमलावर नहीं था।
Case Title : Ajeet Kumar v. State (NCT of Delhi)

