प्रतिकूल आदेश या प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आधार पर ट्रायल ट्रांसफर करने के लिए न्यायिक पक्षपात साबित नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

  • प्रतिकूल आदेश या प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आधार पर ट्रायल ट्रांसफर करने के लिए न्यायिक पक्षपात साबित नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिकूल न्यायिक आदेश और कथित प्रक्रियात्मक अनियमितताएं, अपने आपमें पक्षपात के आरोप पर आपराधिक ट्रायल को ट्रांसफर करने के लिए कानूनी रूप से मान्य आधार नहीं बन सकते।

    जस्टिस प्रतीक जालान एक शिकायतकर्ता की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें 2021 में दर्ज रेप केस को मौजूदा एडिशनल सेशन जज की अदालत से किसी दूसरी अदालत में ट्रांसफर करने की मांग की गई।

    शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि ट्रायल कोर्ट आरोपों को तय करने, उसकी गवाही दर्ज करने, न्यायिक निर्देशों का पालन करने और अतिरिक्त आरोप व अतिरिक्त आरोपी जोड़ने की अर्जियों से जुड़ी उसकी शिकायतों को ठीक से नहीं देख पाया।

    याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई शिकायतें मुख्य रूप से कार्यवाही में प्रतिकूल आदेशों और कथित प्रक्रियात्मक अनियमितताओं से संबंधित हैं।

    कोर्ट ने कहा कि अगर ट्रांसफर याचिका के मकसद से इन आरोपों को सही भी मान लिया जाए तो भी वे अकेले केस को ट्रांसफर करने को सही नहीं ठहरा सकते।

    कोर्ट ने कहा,

    "ऐसी शिकायतों के लिए कानून में उचित न्यायिक उपाय दिए गए, जिनका इस्तेमाल याचिकाकर्ता ने नहीं किया।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता जिन आदेशों का हवाला दे रही थी, वे अलग-अलग जजों द्वारा पारित किए गए और रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पीठासीन न्यायिक अधिकारी की ओर से बाहरी प्रभाव, व्यक्तिगत हित या पहले से बनी धारणा का पता चले।

    कोर्ट ने कहा,

    "इन हालात में पक्षपात के आरोप बेबुनियाद हैं और इससे प्रतिकूल आदेशों के खिलाफ उपलब्ध कानूनी उपायों के बजाय ट्रांसफर की असाधारण शक्ति का इस्तेमाल करने की इजाज़त मिल जाएगी। इसके अलावा, ऐसी दलीलों को मानने से न्यायिक गलती और न्यायिक पक्षपात के बीच के स्पष्ट अंतर को भी धुंधला कर दिया जाएगा।"

    यह मानते हुए कि आरोप कार्यवाही को ट्रांसफर करने के लिए ज़रूरी शर्तों को पूरा नहीं करते, कोर्ट ने याचिका खारिज की।

    हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह आदेश शिकायतकर्ता को कानून के अनुसार उचित कार्यवाही के ज़रिए उसे उपलब्ध उचित ठोस राहत पाने से नहीं रोकेगा।

    Case Title : Pradeep Kaur v. State (NCT of Delhi) & Ors

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