साथ न रहने और शारीरिक संबंध न बनने के कारण वैवाहिक संबंध 'कभी बन ही नहीं पाए': दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक़ के लिए 1 साल की इंतज़ार की अवधि माफ़ की
Shahadat
22 March 2026 7:42 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि जिस शादी में न तो शारीरिक संबंध बने हों और न ही पति-पत्नी साथ रहे हों, उसे किसी भी असली मायने में शादी नहीं कहा जा सकता। ऐसे हालात में तलाक़ के लिए क़ानूनी तौर पर तय इंतज़ार की अवधि पर ज़ोर देने का कोई फ़ायदा नहीं होगा।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीज़न बेंच ने कहा,
"साथ न रहना और शारीरिक संबंध न बनना, साथ ही शादी के तुरंत बाद ही दोनों पक्षों का अलग हो जाना, यह साफ़ दिखाता है कि दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक संबंध कभी भी किसी असली मायने में बन ही नहीं पाए।"
इस तरह कोर्ट ने फ़ैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 14 के तहत तलाक़ की अर्ज़ी दाख़िल करने के लिए ज़रूरी एक साल की अवधि को माफ़ करने से मना किया गया।
दोनों पक्षकारों ने मई, 2025 में शादी की थी, लेकिन वे सिर्फ़ लगभग सात दिनों तक ही साथ रहे। शादी के दौरान उनके बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं बना और न ही इस शादी से कोई बच्चा हुआ। बाद में उन्होंने आपसी सहमति से शादी को ख़त्म करने का फ़ैसला किया।
हालांकि, फ़ैमिली कोर्ट ने एक साल की अवधि को माफ़ करने से यह कहते हुए मना किया कि क़ानूनी ज़रूरत पूरी नहीं हुई।
अपील में दोनों पक्षों ने दलील दी कि शादी को जारी रखने से उन्हें बहुत ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि HMA की धारा 14 का मक़सद यह है कि दोनों पक्षकारों को अपने फ़ैसले पर दोबारा सोचने और सुलह की कोशिश करने के लिए काफ़ी समय मिले, लेकिन इसमें एक शर्त भी है, जो "बहुत ज़्यादा मुश्किलों" वाले मामलों में इस अवधि को माफ़ करने की इजाज़त देती है।
इस मामले में कोर्ट ने अपने चैंबर में दोनों पक्षकारों से बात की और अवधि माफ़ करने के लिए उनके द्वारा बताए गए निजी कारणों से संतुष्ट हो गया।
कोर्ट ने कहा,
"दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से शादी को ख़त्म करने का फ़ैसला किया और साफ़ तौर पर यह ज़ाहिर किया कि वे अब वैवाहिक संबंध जारी नहीं रखना चाहते। रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू होने की कोई संभावना नहीं दिखती। 17. ऐसे हालात में दोनों पक्षकारों से क़ानूनी तौर पर तय अवधि पूरी होने तक इंतज़ार करने पर ज़ोर देने का कोई फ़ायदा नहीं होगा। इससे सिर्फ़ एक ऐसी शादी खिंचती रहेगी, जो सिर्फ़ क़ानून की नज़र में है, असल में नहीं।"
इसके साथ ही कोर्ट ने दोनों पक्षों को आपसी सहमति से तलाक़ की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की इजाज़त दी।
इस मामले को फ़ैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया गया ताकि इस पर जल्द-से-जल्द फ़ैसला लिया जा सके।
Case title: PJ v. N

