प्राइवेट शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता और गवाहों से पूछताछ करनी होगी: दिल्ली हाईकोर्ट

  • प्राइवेट शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता और गवाहों से पूछताछ करनी होगी: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223(1) के तहत आरोपी को नोटिस जारी करने और संज्ञान लेने के मामले में उसकी बात सुनने का मौका देने से पहले, मजिस्ट्रेट को सबसे पहले शिकायतकर्ता और मौजूद गवाहों से शपथ पर पूछताछ करनी होगी, जब तक कि कानून में ऐसी पूछताछ से छूट न दी गई हो।

    जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि औपचारिक रूप से संज्ञान लेने से पहले आरोपी की बात सुनना ज़रूरी है, लेकिन प्राइवेट शिकायत पेश होने पर, शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज करने से पहले तुरंत नोटिस जारी नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट एक ऐसे मामले पर जवाब दे रही थी, जिसमें यह सवाल था कि BNSS के तहत किस चरण पर यह माना जा सकता है कि मजिस्ट्रेट ने किसी अपराध का संज्ञान ले लिया है और किस चरण पर धारा 223(1) के पहले प्रावधान के तहत प्रस्तावित आरोपी को नोटिस जारी करना ज़रूरी है।

    पहले सवाल का जवाब देते हुए बेंच ने कहा कि मजिस्ट्रेट किसी अपराध का संज्ञान तभी ले सकता है, जब वह शिकायतकर्ता और मौजूद गवाहों से शपथ पर पूछताछ कर ले (जब तक कि कानून में छूट न हो) और आरोपी को अपनी बात रखने का मौका दे दे।

    कोर्ट ने कहा,

    "इसलिए BNSS की धारा 223(1) के तहत शिकायतकर्ता और मौजूद गवाहों से शपथ पर पूछताछ (जब तक छूट न हो) और आरोपी की बात सुनना, मजिस्ट्रेट द्वारा अपराध का संज्ञान लेने से पहले के चरण हैं।"

    दूसरे सवाल पर कोर्ट ने कहा कि आरोपी को नोटिस तब जारी करना ज़रूरी है, जब मजिस्ट्रेट शिकायतकर्ता और मौजूद गवाहों से शपथ पर पूछताछ कर ले और यह शुरुआती राय बना ले कि शिकायत को BNSS की धारा 226 के तहत खारिज नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उस पर संज्ञान लिया जा सकता है।

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "हालांकि, संज्ञान लेने का औपचारिक निर्णय मजिस्ट्रेट तभी ले सकता है, जब आरोपी को अपनी बात रखने का मौका दिया गया हो।"

    कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 223, पहले की CrPC की स्थिति से एक बड़ा बदलाव है; CrPC में आरोपी को मामला संज्ञान में लेने (Cognizance) के चरण में अपनी बात रखने का कोई अधिकार नहीं है।

    कोर्ट ने देखा कि CrPC के विपरीत, BNSS के तहत शिकायतकर्ता और गवाहों से पूछताछ करना अब मामला संज्ञान में लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बन गया।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज करने से पहले आरोपी को नोटिस जारी करने से आरोपी को मिले सुनवाई के अधिकार को सीमित किया जा सकता है या उसे बेकार किया जा सकता है।

    कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि धारा 223(1) के पहले प्रावधान (Proviso) के तहत दिया गया सुनवाई का अधिकार सार्थक होना चाहिए। आरोपी मजिस्ट्रेट के सामने वे सीमित आधार रख सकता है, जिन पर मामला संज्ञान में नहीं लिया जाना चाहिए। इनमें यह तर्क भी शामिल है कि अगर शिकायत और शिकायतकर्ता व गवाहों के बयानों को सही भी मान लिया जाए, तो भी कोई अपराध नहीं बनता है।

    इस प्रकार, बेंच ने रेफरेंस का जवाब देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता और गवाहों से पूछताछ करनी चाहिए (जब तक कि उन्हें छूट न मिली हो)। उसके बाद यदि शिकायत BNSS की धारा 226 के तहत जांच में सही पाई जाती है तो औपचारिक रूप से मामला संज्ञान में लेने से पहले आरोपी को नोटिस जारी करना चाहिए और उनकी बात सुननी चाहिए।

    Case Title : Dr Rita Bakshi v. Seema Bajaj & Anr.

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story