कैंसलेशन रिपोर्ट स्वीकार करने के बाद मजिस्ट्रेट 'फंक्टस ऑफिसियो' हो जाते हैं, पुलिस की चूकों की जांच नहीं कर सकते: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

25 March 2026 7:51 PM IST

  • कैंसलेशन रिपोर्ट स्वीकार करने के बाद मजिस्ट्रेट फंक्टस ऑफिसियो हो जाते हैं, पुलिस की चूकों की जांच नहीं कर सकते: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि एक बार जब कोई मजिस्ट्रेट पुलिस द्वारा दायर की गई कैंसलेशन या 'अनट्रेस्ड' (लापता) रिपोर्ट को स्वीकार कर लेता है तो अदालत 'फंक्टस ऑफिसियो' (अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर) हो जाती है। उसके बाद जांच में कथित चूकों की जांच करने या पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश देने के लिए आगे नहीं बढ़ सकती।

    जस्टिस सौरभ बनर्जी ने इस प्रकार पुलिस अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह को स्वीकार किया। इन याचिकाओं में पटियाला हाउस कोर्ट के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) द्वारा पारित आदेशों की एक श्रृंखला को चुनौती दी गई। ACJM ने तीन FIRs में कैंसलेशन और अनट्रेस्ड रिपोर्ट स्वीकार करने के बाद भी जांच अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए।

    हाईकोर्ट ने गौर किया कि हर मामले में ACJM ने 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) की धारा 193 के तहत कैंसलेशन या अनट्रेस्ड रिपोर्ट स्वीकार की थी। ऐसा उन्होंने शिकायतकर्ताओं की संतुष्टि दर्ज करने के बाद किया था, जिन्होंने कोई आपत्ति न होने का हलफनामा भी दायर किया।

    ऐसी परिस्थितियों में अदालत ने फैसला दिया,

    "यह सभी कार्यवाहियों में अंतिम आदेश पारित करने के बराबर था। परिणामस्वरूप, माननीय ACJM के समक्ष प्रत्येक मामले में कार्यवाही सभी उद्देश्यों के लिए 'बंद' मानी गई। ऐसे परिदृश्य में, 15.11.2025 के पहले चुनौती दिए गए आदेश के माध्यम से माननीय ACJM के लिए यह उचित नहीं था कि वे पुलिस या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किसी भी कार्यवाही में की गई कथित चूकों (यदि कोई हों) की जांच में हस्तक्षेप करें; विशेष रूप से तब, जब उनके समक्ष कोई भी मामला लंबित नहीं था।"

    अदालत ने आगे यह भी टिप्पणी की कि मजिस्ट्रेट कोई 'तथ्य-खोज प्राधिकरण' (Fact-Finding Authority) नहीं थे; वे एक नई सिरे से जांच (De-Novo Enquiry) शुरू करके समय के पहिये को पीछे नहीं घुमा सकते थे, क्योंकि यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

    अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही, 'दिल्ली पुलिस अधिनियम' और संबंधित सेवा नियमों के तहत पूरी तरह से विभागीय अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आती है।

    अदालत ने यह भी पाया कि ACJM द्वारा जारी किए गए वे निर्देश, जिनमें सीनियर पुलिस अधिकारियों (जिनमें पुलिस उपायुक्त/DCP और अतिरिक्त DCP शामिल थे) की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य की गई थी, अधिकार क्षेत्र से बाहर थे, क्योंकि संबंधित मामला पहले ही बंद किया जा चुका था।

    हालांकि अदालत ने यह माना कि मजिस्ट्रेट का इरादा किसी अच्छे उद्देश्य या कारण से हो सकता है। फिर भी उसने कहा कि इसके लिए जो तरीका अपनाया गया, वह कानूनन स्वीकार्य नहीं था।

    Case title: Amit Goel & Anr. v. State

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