'न्याय के हित' का मतलब यौन दुराचार के गंभीर आरोपों को दबाना नहीं है: दिल्ली हाईकोर्ट ने समझौते के बावजूद FIR रद्द करने से इनकार किया
Shahadat
7 May 2026 10:14 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़ी FIR रद्द करने से इनकार किया, भले ही दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया। कोर्ट ने कहा कि समझौते के नाम पर यौन दुराचार के गंभीर आरोपों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
जस्टिस गिरीश कथपालिया ने कहा कि "न्याय के हित" का मतलब यह नहीं है कि किसी विवाद को खत्म करने या लंबित मामलों का बोझ कम करने के लिए गंभीर आरोपों को दबा दिया जाए।
बेंच ने टिप्पणी की,
"न्याय के हित" का मतलब सिर्फ़ मुक़दमेबाज़ों की सुविधा के हिसाब से किसी मामले को निपटा देना या कोर्ट में मामलों का बोझ एक केस कम कर देना नहीं है। हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ऐसे गंभीर आरोपों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता और उन्हें बिना सज़ा के जाने नहीं दे सकता।"
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से IPC की धारा 498A, 406, 354 और दहेज निषेध अधिनियम के तहत दर्ज FIR रद्द करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि शिकायतकर्ता के साथ सभी वैवाहिक विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिए गए।
इस याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने बताया कि FIR में शिकायतकर्ता के जीजा पर यौन दुराचार के गंभीर आरोप लगाए गए, जिन्हें सामान्य वैवाहिक विवाद का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने अपने रिकॉर्ड में दर्ज किया कि शिकायतकर्ता ने अपने जीजा पर यौन दुराचार और धमकी देने के विशिष्ट आरोप लगाए, जिनकी पुष्टि उसने कोर्ट में भी की।
इसलिए CrPC की धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करके ऐसे गंभीर आरोपों को "दबाने" से इनकार करते हुए कोर्ट ने कहा,
"ये सिर्फ़ वैवाहिक या दीवानी गलतियों के आरोप नहीं हैं। ये एक महिला द्वारा अपने जीजा पर लगाए गए जघन्य आरोप हैं।"
कोर्ट ने आगे कहा कि वह झूठी वैवाहिक FIRs के बढ़ते चलन से अनजान नहीं है, लेकिन, "कोर्ट यह सामान्य राय नहीं बना सकता कि ऐसे आरोप हमेशा झूठे होते हैं। सिर्फ़ इसलिए लगाए जाते हैं ताकि आरोपी को ज़मानत न मिल सके।"
कोर्ट ने कहा कि ऐसे हर मामले की जांच उसके अपने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर की जानी चाहिए, अन्यथा, असली पीड़ितों को भी नुकसान उठाना पड़ेगा।
Case title: Ashish Kalra And Others v. State

