पति गुज़ारा-भत्ता देने की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए पहले से सुलझे हुए शादी के विवाद को फिर से नहीं उठा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
1 Sept 2026 10:55 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पति CrPC की धारा 125 के तहत अपनी पत्नी का गुज़ारा-भत्ता देने की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए शादी से जुड़े उस विवाद को फिर से नहीं खोल सकता, जिसका फ़ैसला पहले ही हो चुका है।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने यह बात एक पति की रिविज़न याचिका खारिज करते हुए कही। पति ने फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया।
दोनों की शादी 2002 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। 2003 में पति ने यह घोषणा करवाने के लिए मुक़दमा दायर किया कि वह अविवाहित है और महिला को अपनी पत्नी होने का दावा करने से रोकने के लिए रोक (इंजंक्शन) की मांग की।
शुरुआत में मुक़दमा उसके पक्ष में तय हुआ। हालांकि, पत्नी ने इस फ़ैसले के खिलाफ़ अपील की, जिसे 2006 में मंज़ूरी मिल गई। पति की दूसरी अपील 2011 में खारिज कर दी गई, जिससे शादी के पक्ष में फ़ैसला बरकरार रहा।
इस बीच पत्नी ने 2008 में CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ता पाने के लिए कार्यवाही शुरू की थी।
फ़ैमिली कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह याचिका दायर करने की तारीख़ से दिसंबर 2011 तक ₹7,000 प्रति माह, जनवरी 2012 से दिसंबर 2013 तक ₹10,000 प्रति माह और उसके बाद ₹10,000 प्रति माह का भुगतान करे। इसके अलावा, उसे मुक़दमे के खर्च के तौर पर ₹11,000 भी देने थे।
हाईकोर्ट के सामने पति ने फिर से तर्क दिया कि महिला उसकी कानूनी रूप से ब्याही पत्नी नहीं है और शादी के रिश्ते का उसका दावा सही नहीं है। उसने यह भी तर्क दिया कि पहले का अपील फ़ैसला तकनीकी आधार पर था, न कि मेरिट (गुण-दोष) के आधार पर, इसलिए गुज़ारा-भत्ते की कार्यवाही में वह उसके खिलाफ़ लागू नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज किया और कहा कि दोनों की शादी का मुद्दा पहले ही कार्यवाही में पक्के तौर पर तय हो चुका है।
कोर्ट ने कहा,
"आज, याचिकाकर्ता पहले की कार्यवाही के नतीजों से बंधा हुआ है, क्योंकि वे अंतिम और निर्णायक हैं। याचिकाकर्ता बाद के किसी दूसरे/नए मुक़दमे में उन्हीं तय हो चुके मुद्दों को फिर से उठाकर उन नतीजों से बचने की कोशिश नहीं कर सकता।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को शादी के तय हो चुके मामले को दोबारा खोलने की कोशिश करके "एक और मौका" पाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
इसलिए कोर्ट ने माना कि महिला याचिकाकर्ता की कानूनी रूप से ब्याही पत्नी है, इसलिए वह CrPC की धारा 125 के दायरे में आती है।
मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक पति के तौर पर याचिकाकर्ता का अपनी पत्नी का "भरण-पोषण करने का कानूनी दायित्व" है, इसलिए उसकी याचिका खारिज की।
Case title: A v. M


