देशव्यापी इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम के लिए एकमात्र एजेंसी के तौर पर C-DOT की नियुक्ति सही: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
2 Sept 2026 10:11 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के उस फैसले को सही ठहराया, जिसके तहत 'सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ़ टेलीमैटिक्स' (C-DOT) को देशव्यापी 'सेल ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम' लागू करने के लिए एकमात्र एजेंसी नियुक्त किया गया। इस सिस्टम का मकसद आपदाओं और अन्य सार्वजनिक आपात स्थितियों के दौरान लोगों के मोबाइल फ़ोन पर सीधे इमरजेंसी अलर्ट भेजना है।
जस्टिस सचिन दत्ता ने 'उटिमाको टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड' की याचिका खारिज की। सेल ब्रॉडकास्ट-आधारित प्रोडक्ट्स और सर्विसेज़ देने वाली इस कंपनी ने अक्टूबर 2024 के उस 'ऑफिस मेमोरेंडम' (OM) को चुनौती दी थी, जिसके तहत देशव्यापी कार्यान्वयन की जिम्मेदारी C-DOT को सौंपी गई।
बेंच ने कहा कि 'सचेत' (Sachet) प्रोजेक्ट कोई "सामान्य कमर्शियल खरीद" नहीं थी, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी एक पहल थी, जिसका मकसद आपदाओं के दौरान इमरजेंसी अलर्ट को तेज़ी से फैलाना था।
बता दें, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि OM 'जनरल फाइनेंशियल रूल्स, 2017' (GFR) का उल्लंघन करता है, 'नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी' (NDMA) की उन सिफारिशों को नज़रअंदाज़ करता है जिनमें दो-वेंडर मॉडल या ओपन टेंडर का समर्थन किया गया। इसमें ओपन टेंडर प्रक्रिया को छोड़ने के लिए उस समय का कोई ठोस कारण नहीं बताया गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि फैसला लेने वाली अथॉरिटी ने NDMA के विचारों पर विचार किया।
कोर्ट ने कहा,
"ऐसा फैसला जिसमें किसी सिफारिश पर विचार किया गया हो और ठोस कारणों से उससे जानबूझकर अलग हटकर फैसला लिया गया हो, उसे ऐसे फैसले के बराबर नहीं माना जा सकता, जिसमें उस सिफारिश को नज़रअंदाज़ कर दिया गया हो।"
इसके अलावा, कोर्ट ने माना कि सेल ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम को चालू करना एक 'नॉन-कंसल्टिंग सर्विस' (गैर-परामर्श सेवा) थी, जिस पर GFR का नियम 204 लागू होता है। यह नियम "असाधारण स्थिति" में किसी खास चुने हुए कॉन्ट्रैक्टर से नॉन-कंसल्टिंग सर्विस लेने की इजाज़त देता है, बशर्ते इसके लिए फाइनेंशियल एडवाइज़र से सलाह ली गई हो और विस्तृत कारण बताए गए हों।
कोर्ट ने कहा कि इन ज़रूरतों को काफी हद तक पूरा किया गया; C-DOT के प्रस्ताव पर फाइनेंशियल एडवाइज़र की मौजूदगी में विचार किया गया और बाद में सक्षम अधिकारियों ने इसे मंज़ूरी दी थी।
कोर्ट ने C-DOT और याचिकाकर्ता के बीच तुलनात्मक तकनीकी मूल्यांकन की मांग को भी खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 226 के तहत न्यायिक समीक्षा का संबंध फैसला लेने की प्रक्रिया से होता है, न कि फैसले के गुण-दोष से।
कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने को लेकर सरकार की चिंताओं पर भी ध्यान दिया।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इस प्रोजेक्ट को 99.82 करोड़ रुपये के बजट के साथ मंज़ूरी दी जा चुकी है और ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम को लागू भी किया जा चुका है। इसलिए देश भर में काम कर रहे इमरजेंसी-अलर्ट सिस्टम में दखल देना "पूरी तरह से अनुचित" होगा।
साथ ही कोर्ट ने गृह मंत्रालय और केंद्र सरकार के अन्य विभागों को निर्देश दिया कि वे भविष्य में नॉमिनेशन के ज़रिए की जाने वाली खरीद के लिए सुधार के कदम उठाएं।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि GFR के खास प्रावधान का साफ़ तौर पर इस्तेमाल किया जाए, इसके लिए ज़रूरी वजहों को उसी समय दर्ज किया जाए और उस प्रावधान का ध्यान रखते हुए सक्षम अधिकारी से मंज़ूरी ली जाए।
Case title: Utimaco Technologies Pvt Ltd. v. UoI


