दिल्ली हाईकोर्ट ने ससुराल वालों के शांतिपूर्ण रहने के अधिकार की रक्षा के लिए बहू को घर से निकालने का फैसला सही ठहराया

Shahadat

13 May 2026 8:17 PM IST

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने ससुराल वालों के शांतिपूर्ण रहने के अधिकार की रक्षा के लिए बहू को घर से निकालने का फैसला सही ठहराया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत एक बहू और उसके बेटे को ससुराल वालों के घर से निकालने के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले के तथ्यों को देखते हुए वरिष्ठ नागरिकों के शांतिपूर्ण ढंग से रहने के अधिकार को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

    जस्टिस पुरुशेंद्र कुमार कौरव ने एक विधवा और उसके बेटे की तरफ से दायर रिट याचिका खारिज की। इस याचिका में उन्होंने डिविजनल कमिश्नर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें ससुराल वालों की संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया गया।

    यह विवाद फरवरी 2020 में याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु के बाद शुरू हुआ। महिला और उसका बेटा उस घर में ही रहते रहे, जबकि पारिवारिक संपत्तियों, LIC पॉलिसियों और अन्य वित्तीय संपत्तियों को लेकर विवाद सामने आने लगे।

    इसके बाद, ससुराल वालों ने 'वरिष्ठ नागरिक अधिनियम' के तहत अधिकारियों से संपर्क किया। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है और याचिकाकर्ताओं को संपत्ति से बाहर निकालने की मांग की।

    शुरुआत में, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ताओं को संपत्ति के केवल ग्राउंड फ्लोर (निचले तल) वाला हिस्सा खाली करने का निर्देश दिया था। हालांकि, अपील करने पर डिविजनल कमिश्नर ने पूरे परिसर को खाली करने का आदेश दिया। उन्होंने पाया कि दोनों पक्षों के बीच संबंध बहुत ज़्यादा खराब हो चुके थे और एक साथ रहना अब असंभव हो गया।

    हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' के तहत यह संपत्ति "साझा घर" (Shared Household) है। इसलिए बहू को वहाँ रहने का अधिकार है।

    उन्होंने उन संपत्तियों में भी अपने अधिकार का दावा किया, जो कथित तौर पर पैतृक व्यवसाय से मिले पैसों से खरीदी गई थीं। साथ ही अपने मृत पति की LIC पॉलिसियों से मिलने वाली रकम में भी हिस्सा माँगा।

    हालांकि, कोर्ट ने यह फैसला दिया कि 'वरिष्ठ नागरिक अधिनियम' के तहत होने वाली कार्यवाही प्रकृति में संक्षिप्त (Summary) होती है। इसे संपत्ति के मालिकाना हक, विरासत, पैतृक संपत्ति के दावों या वित्तीय अधिकारों से जुड़े जटिल दीवानी विवादों को सुलझाने का मंच नहीं बनाया जा सकता।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत अधिकारियों का अधिकार क्षेत्र एक सीमित, लेकिन महत्वपूर्ण उद्देश्य तक ही सीमित है। इस उद्देश्य का लक्ष्य सीनियर सिटीजन्स की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि वे अपनी ही संपत्ति में बिना किसी रुकावट के शांतिपूर्वक और सुरक्षित रूप से रह सकें।"

    S. Vanitha बनाम Deputy Commissioner (2021) मामले का हवाला दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया था कि किसी महिला के साझा घर में रहने के अधिकार और सीनियर सिटीजन्स के शांति से रहने के अधिकार के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है, खासकर तब, जब वह घर सीनियर सिटीजन्स का ही हो।

    मौजूदा मामले में कोर्ट ने यह पाया कि याचिकाकर्ता आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर नहीं थी। कोर्ट ने यह भी देखा कि वह एक सरकारी स्कूल में टीचर थी और हर महीने ₹1 लाख से ज़्यादा कमाती थी, और उसके बच्चे भी अब बड़े हो चुके थे।

    कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि याचिकाकर्ताओं के पास पहले से ही रहने के लिए एक और जगह मौजूद थी, और ससुर के इस बयान को भी रिकॉर्ड किया कि याचिकाकर्ताओं के घर खाली करने के बाद वह उस प्रॉपर्टी के कागज़ात उन्हें सौंपने के लिए तैयार हैं।

    इसलिए कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इनकार किया और याचिकाकर्ताओं को 45 दिनों के अंदर वह प्रॉपर्टी खाली करने का निर्देश दिया।

    Case title: RT v. GNCTD

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