पति का दावा- शादी के समय वह नशे में था: दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की तलाक की अर्ज़ी

Shahadat

19 Aug 2026 7:06 PM IST

  • पति का दावा- शादी के समय वह नशे में था: दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की तलाक की अर्ज़ी

    दिल्ली हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति की शादी खत्म करने की अपील खारिज की। व्यक्ति का दावा था कि उसकी शादी अमान्य है, क्योंकि 2008 में शादी की रस्में निभाते समय वह किसी नशीली दवा (सेडेटिव) के असर में था।

    जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीजन बेंच ने कहा कि पति का दावा ज़्यादा से ज़्यादा हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 12(1)(c) के तहत आ सकता है। यह धारा कहती है कि अगर शादी के लिए सहमति ज़बरदस्ती या धोखाधड़ी से ली गई हो, तो शादी को 'वॉयडएबल' (रद्द करने योग्य) माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में धोखाधड़ी का पता चलने के एक साल के भीतर शादी रद्द करने की अर्ज़ी दाखिल करनी होती है।

    कोर्ट ने कहा कि यह बात मानी हुई कि शादी की वैधता को लेकर पति ने पत्नी द्वारा HMA की धारा 9 के तहत दायर अर्ज़ी में चुनौती दी थी, जिसका फैसला उसके खिलाफ आया था और वह फैसला अंतिम हो चुका था।

    कोर्ट ने पति की उस अपील को खारिज किया, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी, जिसने HMA की धारा 13(1A) और 13(1)(ib) के तहत उसकी तलाक की अर्ज़ी खारिज की थी।

    दोनों की शादी 20 फरवरी 2008 को आर्य समाज मंदिर में हुई। इस शादी से कोई बच्चा नहीं हुआ। वैवाहिक कलह के बाद पत्नी ने जून 2008 में IPC की धारा 498A के तहत शिकायत दर्ज कराई और बाद में वैवाहिक अधिकारों की बहाली (restitution of conjugal rights) के लिए HMA की धारा 9 के तहत कार्यवाही शुरू की।

    पत्नी की बहाली की अर्ज़ी सितंबर 2013 में मंज़ूर कर ली गई। हालांकि, दोनों ने साथ रहना शुरू नहीं किया। 2016 में पति ने तलाक के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और अन्य बातों के अलावा यह तर्क दिया कि ज़रूरी समय तक वैवाहिक अधिकारों की बहाली नहीं हुई।

    हाईकोर्ट के सामने पति ने तर्क दिया कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश मिलने के बावजूद पत्नी अलग रह रही थी, इसलिए वह HMA की धारा 13(1A) के तहत तलाक का हकदार था। कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट के रिकॉर्ड से पता चलता है कि पति ने ही तलाक की अर्जी दाखिल करने से पहले या वैवाहिक अधिकारों की बहाली (restitution of conjugal rights) का आदेश मिलने के बाद भी मामले को सुलझाने की कोई कोशिश नहीं की।

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पत्नी हमेशा उसके साथ रहने और उनके बीच चल रहे सभी कानूनी मामलों को वापस लेने के लिए तैयार थी।

    कोर्ट ने कहा,

    "इस मामले में भी प्रतिवादी (पत्नी) ने आदेश को लागू करने की कोशिश की, लेकिन अपीलकर्ता (पति) के प्रतिवादी (पत्नी) के साथ रहने से इनकार करने और यह मानने कि उसने कभी अपनी पत्नी को वापस लाने की कोशिश नहीं की - बल्कि अपने खिलाफ कोर्ट का आदेश होने के बावजूद प्रतिवादी के साथ अपनी शादी से ही इनकार करने - के कारण ऐसा नहीं हो सका। यह सब HMA की धारा 23(1A) के तहत 'गलती' (wrong) शब्द के दायरे में आता है।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि पति ने विरोधाभासी रुख अपनाया; उसने शादी के अस्तित्व और वैधता पर सवाल उठाया और साथ ही HMA के तहत उसी शादी को खत्म करने की मांग भी की।

    बेंच ने कहा,

    "एक तरफ तो उसने शादी की वैधता पर सवाल उठाया और दूसरी तरफ उसी शादी को खत्म करने की मांग की।"

    बेंच ने माना कि कोई पक्ष "एक ही समय में एक बात को सही और दूसरी को गलत नहीं ठहरा सकता" (approbate and reprobate simultaneously)।

    कोर्ट ने कहा,

    "कोई पक्ष एक ही समय में एक बात को सही और दूसरी को गलत नहीं ठहरा सकता, यानी शादी के होने पर सवाल उठाना और साथ ही HMA के तहत उसे खत्म करने की मांग करना। इसलिए अपीलकर्ता का यह व्यवहार साफ तौर पर 'अपनी गलती' (own wrong) की श्रेणी में आता है और HMA की धारा 23(1)(a) के प्रावधान को लागू करने के लिए काफी है। वहीं प्रतिवादी ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे ऐसी स्थिति बने कि अपीलकर्ता के लिए साथ रहना असंभव हो जाए।"

    बेंच ने पति की इस दलील को भी खारिज किया कि वह पत्नी को नियमित रूप से 10,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता (Maintenance) दे रहा है।

    कोर्ट ने माना कि गुजारा भत्ता देना एक कानूनी जिम्मेदारी है और अकेले इसके आधार पर कोई जीवनसाथी तलाक का आदेश पाने का हकदार नहीं हो सकता।

    यह मानते हुए कि फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई गड़बड़ी, गैर-कानूनी बात या कमी नहीं थी, बेंच ने पति की अपील खारिज की।

    Title: X v. Y

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