दिल्ली हाईकोर्ट ने UAPA के तहत आरोपी को 8 साल जेल में रहने के बाद दी ज़मानत, कहा- ट्रायल के जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं

Shahadat

16 Sept 2026 7:21 PM IST

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने UAPA के तहत आरोपी को 8 साल जेल में रहने के बाद दी ज़मानत, कहा- ट्रायल के जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं

    दिल्ली हाईकोर्ट ने गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967 के तहत दर्ज मामले में आरोपी को ज़मानत दी। कोर्ट ने यह देखते हुए ज़मानत दी कि वह लगभग आठ साल से जेल में है और ट्रायल के जल्द खत्म होने की कोई उम्मीद नहीं है।

    जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की डिवीज़न बेंच मोहम्मद साकिब की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनी ज़मानत अर्ज़ी खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।

    यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 120B, 121, 121A और 122, साथ ही UAPA के विभिन्न प्रावधानों और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराओं 4 और 5 के तहत दर्ज किया गया।

    राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने आरोप लगाया कि साकिब 'हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम' समूह से जुड़ा था और कश्मीरी उग्रवादियों के लिए हथियार हासिल करने में मदद कर रहा था। उसे 26 दिसंबर, 2018 को हिरासत में लिया गया।

    उसे ज़मानत देते हुए कोर्ट ने गौर किया कि NIA द्वारा बताए गए 120 गवाहों में से केवल 40 से ही पूछताछ की गई।

    हालांकि, NIA ने कोर्ट को बताया था कि वह 39 गवाहों को हटा देगी, फिर भी बेंच ने कहा कि इसे ध्यान में रखने के बाद भी, कोर्ट का मानना ​​है कि ट्रायल के "जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं है।"

    कोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराया कि हालांकि कानूनी प्रतिबंधों पर विचार किया जाना चाहिए, लेकिन उनकी सख्ती तब "कम" हो सकती है, जब उचित समय के भीतर ट्रायल पूरा होने की कोई संभावना न हो और जेल में बिताई गई अवधि काफी लंबी हो गई हो।

    इसमें 'खुर्रम परवेज़ बनाम राष्ट्रीय जांच एजेंसी' मामले का हवाला दिया गया, जिसमें यह कहा गया कि धारा 43D(5) के तहत कानूनी प्रतिबंध संवैधानिक अदालतों के ज़मानत देने के अधिकार क्षेत्र को पूरी तरह से खत्म नहीं करते हैं, खासकर तब जब लगातार जेल में रहने से भारत के संविधान के भाग III के तहत चिंताएं पैदा होती हों।

    इसके अलावा, बेंच ने गौर किया कि साकिब की कश्मीर यात्राओं से जुड़े तीन मुख्य गवाहों से ट्रायल कोर्ट के सामने पहले ही पूछताछ की जा चुकी थी। उनके बयानों को देखने के बाद कोर्ट ने कहा कि साकिब के खिलाफ लगाए गए आरोपों के आधार पर उसे ज़मानत देने से इनकार करने का कोई कारण नहीं है।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि वह सबूतों का विस्तार से विश्लेषण करने से बच रहा है ताकि ट्रायल पर कोई असर न पड़े। कोर्ट ने पाया कि पहली नज़र में गवाहों के बयान इतने गंभीर नहीं थे कि साकिब की हिरासत को और बढ़ाया जाए।

    इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के बारे में कोर्ट ने कहा कि हालांकि साकिब के फ़ोन से कथित तौर पर मिलीं चैट "गंभीर प्रकृति" की थीं, लेकिन ट्रायल के दौरान लंबी हिरासत को देखते हुए वे ज़मानत न देने का आधार नहीं बनतीं।

    इसलिए बेंच ने उसे कड़ी शर्तों पर ज़मानत दी, जिसमें उसका पासपोर्ट जमा करना और यह निर्देश शामिल है कि वह दिल्ली में ट्रायल में शामिल होने या NIA ऑफिस में रिपोर्ट करने के अलावा अपने गृह जिले को नहीं छोड़ सकता।

    कोर्ट ने साकिब को सोशल मीडिया पर देश-विरोधी सामग्री फैलाने से भी रोका।

    Case title: Mohammad Saqib@ Saqib Iftekar v. NIA

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