दिल्ली हाईकोर्ट ने PMLA ज़मानत सुनवाई की 'बेहद परेशान करने वाली' कवरेज पर इंडियन एक्सप्रेस को लगाई फटकार
Shahadat
5 May 2026 9:26 AM IST

कथित नकली कैंसर-रोधी दवाओं के रैकेट से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पाँच आरोपियों को ज़मानत देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने ज़मानत सुनवाई के दौरान 'द इंडियन एक्सप्रेस' द्वारा प्रकाशित रिपोर्टों की सीरीज पर कड़ी आपत्ति जताई।
जस्टिस गिरीश कथपालिया ने इन प्रकाशनों को "बेहद परेशान करने वाला" बताया। उन्होंने कहा कि ये लेख, जो लगातार चार दिनों तक पहले पन्ने पर छपे थे, ऐसा लग रहा था कि वे न केवल मामले की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, बल्कि कोर्ट द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ED) से पूछे गए सवालों का पहले से ही अंदाज़ा लगाकर उनका जवाब भी दे रहे हैं।
कोर्ट ने कहा कि इन लेखों में आरोपियों के बीच कथित तौर पर हुई WhatsApp चैट को पूरी तरह से उजागर कर दिया गया, बिना किसी भी तरह की काट-छाँट या पहचान छिपाने की कोशिश किए।
कोर्ट ने आगे कहा कि इन प्रकाशनों के नतीजे बेहद चिंताजनक थे। अगर लेखों की यह सीरीज किसी भी तरह से सीधे या परोक्ष रूप से राज्य की किसी भी संस्था के इशारे पर तैयार की गई- जिसका मकसद न्यायिक सोच को प्रभावित करना, डराना या चुपके से अपने पक्ष में करना था - तो यह 'कानून के शासन' (Rule of Law) की जड़ों पर ही सीधा हमला होगा।
कोर्ट ने कहा,
"ऐसा आचरण न केवल निंदनीय है, बल्कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता पर गंभीर और अस्वीकार्य हमला भी है। इस तरह के मीडिया इस्तेमाल के ज़रिए न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश का खतरा न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि बेहद परेशान करने वाला भी है। इसकी स्पष्ट शब्दों में निंदा की जानी चाहिए।"
कोर्ट ने आगे कहा:
"जैसा कि ज़ाहिर है, कोई भी कोर्ट किसी मामले पर फैसला सुनाते समय इस तरह के लेखों से प्रभावित नहीं होगा। क्योंकि, दशकों के काम के अनुभव के बाद हमारा दिमाग ऐसी कोशिशों के प्रति पूरी तरह से तटस्थ और अप्रभावित रहने के लिए अभ्यस्त हो चुका है। ऊपर कही गई बातों का मकसद सिर्फ एक चेतावनी देना है ताकि भविष्य में इस तरह की हरकत दोबारा न हो।"
कोर्ट ने ये टिप्पणियाँ तब कीं, जब वह मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत ED द्वारा दर्ज मामले में कई आरोपियों - परवेज़ खान, नीरज चौहान, सूरज शत, राजेश कुमार और लवी नरूला - को ज़मानत दे रहा था।
यह मामला मार्च 2024 में दर्ज FIR से शुरू हुआ था। इस FIR में आरोप लगाया गया कि गिरोह (सिंडिकेट) नकली कैंसर-रोधी दवाएँ बनाने और बेचने में शामिल था। ये लोग Keytruda और Opdyta जैसे महंगे इंजेक्शनों की खाली शीशियों को दोबारा भरकर नकली दवाएं तैयार करते थे। ED के केस में गंभीर कमियाँ पाते हुए कोर्ट ने कहा कि हिरासत में लिए गए आरोपियों के बयान "एक-दूसरे की ज़्यादातर कॉपी-पेस्ट थे, जिनमें उनकी अपनी-अपनी भूमिकाओं के हिसाब से थोड़ा-बहुत बदलाव किया गया।"
कोर्ट ने आगे कहा कि हर बयान "मक्खन पर गर्म चाकू की तरह आसानी से" सामने आया। यह थोड़ा अविश्वसनीय लगता है कि कोई व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से जाँच एजेंसी के सामने खुद को फँसाने वाला ऐसा बयान देगा, जब तक कि उसे हिरासत में ज़बरदस्ती न किया गया हो।
कोर्ट ने कहा,
"जब ऐसे खुद को फंसाने वाले बयान PMLA की धारा 50 के तहत रिकॉर्ड किए जाते हैं, जबकि बयान देने वाला व्यक्ति ED की हिरासत में होता है तो उन्हें अपनी मर्ज़ी से दिए गए बयान नहीं माना जा सकता और उन्हें खारिज कर दिया जाना चाहिए।"
कोर्ट ने यह भी पाया कि इस अपराध में कथित तौर पर शामिल कई लोगों की भूमिका आरोपियों की भूमिका से ज़्यादा गंभीर, या कम-से-कम वैसी ही बताई गई, लेकिन उनमें से कई को गिरफ्तार नहीं किया गया। कुछ को तो ED ने आरोपी के तौर पर नाम भी नहीं दिया।
कोर्ट ने कहा,
"यह भेदभावपूर्ण रवैया इस कानूनी स्थिति की रोशनी में भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि PMLA की धारा 3 के तहत अपराध के लिए PMLA की धारा 4 के तहत सिर्फ़ 07 साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है (जब तक कि कथित अपराध शेड्यूल के भाग A के पैराग्राफ 2 के तहत विशेष रूप से न बताया गया हो)। यह देखना निश्चित रूप से परेशान करने वाला है कि ज़्यादा से ज़्यादा 07 साल की जेल की सज़ा वाले अपराध के मामले में कुछ आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। 02 साल से ज़्यादा जेल में बिताने के बाद भी उन्हें बिना किसी ट्रायल के अधिकतम तय सज़ा की अवधि तक जेल में रहना पड़ता है; जबकि उसी अपराध में वैसी ही या ज़्यादा गंभीर भूमिका वाले अन्य आरोपियों को गिरफ्तार भी नहीं किया जाता। वह भी तब, जब नकली कैंसर की दवाइयों के कारोबार के मुख्य अपराध के मामले में मौजूदा आरोपियों/आवेदकों में से तीन को पहले ही ज़मानत मिल चुकी है, जबकि बाकी दो के खिलाफ़ अभी तक चार्जशीट भी दायर नहीं की गई, फिर भी वे जेल में ही हैं।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"...यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि आरोपी/आवेदक उन पर लगाए गए अपराध के दोषी नहीं हैं। जहां तक PMLA की धारा 45 के दूसरे हिस्से का सवाल है, जिसमें ज़मानत पर रहते हुए उनके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना न होने की बात कही गई तो ऐसी संभावना का अनुमान किसी ठोस सबूत के आधार पर लगाया जाना चाहिए। यह सबूत आरोपियों/आवेदकों के पिछले रिकॉर्ड और उनकी आदतों के रूप में होना चाहिए। हालांकि, मौजूदा मामलों में उनके खिलाफ़ ऐसे किसी पिछले रिकॉर्ड या आदतों का आरोप नहीं लगाया गया है।"
Title: PRAVEZ KHAN v. ED & other connected matters

