जिन्न उतारने के बहाने नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपी मौलवी को जमानत नहीं, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- अंधविश्वास का उठाया फायदा
Amir Ahmad
6 May 2026 5:18 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने उस स्वयंभू धार्मिक उपचारकर्ता को जमानत देने से इनकार किया, जिस पर 'जिन्न उतारने' के नाम पर एक नाबालिग लड़की से यौन शोषण करने का आरोप है।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया दर्शाती है कि आरोपी जिसे मौलवी बताया गया, ने पीड़िता की शारीरिक और मानसिक कमजोरी तथा उसके परिवार के अंधविश्वास का अनुचित लाभ उठाया।
मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 तथा POCSO Act की धाराओं 4 और 6 के तहत दर्ज FIR से संबंधित है।
अभियोजन के अनुसार नाबालिग लड़की लंबे समय से बीमार थी, जिसके कारण परिवार को विश्वास हो गया कि उस पर किसी बुरी आत्मा का साया है। एक रिश्तेदार की सलाह पर उसे आरोपी के पास ले जाया गया, जिसने स्वयं को मौलवी और धार्मिक उपचारकर्ता बताया।
आरोप है कि तथाकथित इलाज के दौरान आरोपी ने पहले पीड़िता से अनुचित प्रश्न पूछे और बाद में उसके घर जाकर अकेले में उपचार करने की बात कही।
इसके बाद आरोपी ने कथित रूप से कहा कि 'जिन्न' केवल अश्लील कृत्यों के माध्यम से ही निकाला जा सकता है और इसी बहाने उसने नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया।
घटना के अगले दिन पीड़िता ने अपनी मां को पूरी बात बताई, जिसके बाद पुलिस को सूचना दी गई और FIR दर्ज की गई। मेडिकल टेस्ट और जांच के बाद आरोपपत्र सेशन कोर्ट में दाखिल किया गया।
आरोपी की ओर से कहा गया कि वह अक्टूबर, 2019 से हिरासत में है और इतनी लंबी कैद उसके शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। यह भी तर्क दिया गया कि 18 में से 12 गवाहों की गवाही हो चुकी है, इसलिए साक्ष्य से छेड़छाड़ की संभावना नहीं है।
हालांकि, अदालत ने यह दलीलें स्वीकार नहीं कीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता का दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) कीी धारा 164 के तहत दर्ज बयान तथा ट्रायल कोर्ट में उसकी गवाही अभियोजन के आरोपों का समर्थन करती है।
बेंच ने कहा,
“आरोपी ने उपचार देने के बजाय कथित रूप से उसी विश्वास का दुरुपयोग कर पीड़िता का शोषण किया।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गवाहों की गवाही में कथित विरोधाभास या पीड़िता की विश्वसनीयता जैसे मुद्दों की विस्तृत जांच जमानत चरण पर नहीं की जा सकती।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों की गंभीरता उपलब्ध साक्ष्य और मुकदमे की वर्तमान स्थिति को देखते हुए आरोपी को जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता।
इसी के साथ जमानत याचिका खारिज की गई।

