कस्टडी के मामलों में देरी से बच्चे का नुकसान होता है: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

24 Jun 2026 6:26 PM IST

  • कस्टडी के मामलों में देरी से बच्चे का नुकसान होता है: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी से जुड़े विवादों को सुलझाने में देरी से बच्चे का ही नुकसान होता है। कोर्ट ने जीवनसाथी को बच्चा सौंपने में देरी करने के लिए बार-बार कोर्ट जाने के चलन के खिलाफ भी चेतावनी दी।

    जस्टिस तेजस करिया और जस्टिस मधु जैन की बेंच ने एक मां की अपील खारिज करते हुए यह बात कही। मां ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील की थी, जिसमें पिता को गर्मियों की छुट्टियों के दौरान अपनी नाबालिग बेटी की अंतरिम कस्टडी दी गई।

    कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का हित सबसे ज़रूरी होता है और नाबालिग को अपने दोनों माता-पिता के साथ सार्थक संबंध बनाने और बनाए रखने का अधिकार है।

    बेंच ने कहा,

    "कस्टडी के मामलों में देरी से बच्चे का ही नुकसान होता है। नाबालिग बच्चे को अपने दोनों माता-पिता के साथ सार्थक समय बिताने का अधिकार है। छुट्टियों के समय बच्चे को सौंपने में देरी करने के लिए बार-बार कोर्ट जाने के चलन को अगर मंज़ूरी दी गई तो यह बच्चे के हित और उसके दोनों माता-पिता के साथ संबंधों के लिए नुकसानदेह होगा।"

    मां ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें पिता को छुट्टियों के दौरान बच्चे की अंतरिम कस्टडी की इजाज़त दी गई। मां का तर्क था कि पिता पहले तय मुलाक़ात के नियमों का पालन करने में नाकाम रहे थे और वे अकेले बच्चे की देखभाल करने में सक्षम नहीं थे।

    इस तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मां को खुद भी इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी कि पिता भारत में रहने के दौरान बच्चे की कस्टडी लें। ऐसे हालात में उनका यह तर्क नहीं माना जा सकता कि लंदन में रहने के दौरान पिता अकेले बच्चे की देखभाल करने में सक्षम नहीं थे।

    कोर्ट ने मौजूदा कार्यवाही में पहले के मुलाक़ात आदेशों के उल्लंघन के आरोपों पर भी विचार करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी शिकायतों को उचित अवमानना ​​कार्यवाही में सुलझाया जा सकता है। इसके आधार पर बच्चे को पिता के साथ सार्थक समय बिताने से वंचित नहीं किया जा सकता।

    इस तरह कोर्ट ने अपील खारिज की और पिता के पक्ष में अंतरिम कस्टडी की व्यवस्था बरकरार रखी।

    Case title: G v. M

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