रिविज़न में असफलता के बाद BNSS की धारा 528 के तहत निहित शक्तियों का इस्तेमाल 'पिछले दरवाज़े से एंट्री' के तौर पर नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

  • रिविज़न में असफलता के बाद BNSS की धारा 528 के तहत निहित शक्तियों का इस्तेमाल पिछले दरवाज़े से एंट्री के तौर पर नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कोई पक्ष रिविज़न (पुनरीक्षण) का उपाय आज़माने के बाद भी असफल रहने पर किसी आदेश को चुनौती देने के लिए आमतौर पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत निहित शक्तियों का इस्तेमाल 'पिछले दरवाज़े से एंट्री' के तौर पर नहीं कर सकता, जब तक कि मामले में घोर अन्याय न हुआ हो।

    जस्टिस गिरीश कथपालिया ने कहा कि हालांकि हाईकोर्ट की निहित शक्तियां व्यापक हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल नियमित रूप से इस तरह नहीं किया जा सकता कि BNSS की धारा 438(3) के तहत कानूनी रोक ही बेकार हो जाए।

    कोर्ट एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस व्यक्ति ने अपनी पत्नी की COVID-19 महामारी के दौरान हुई मौत के मामले में FIR दर्ज करने के निर्देश मांगने वाली अपनी अर्ज़ी खारिज होने को चुनौती दी थी।

    उस व्यक्ति ने पहले CrPC की धारा 156(3) (जो BNSS की धारा 175(3) के बराबर है) के तहत मजिस्ट्रेट से संपर्क किया। उसने आरोप लगाया कि अस्पताल में ऑक्सीजन सप्लाई रुकने के कारण उसकी पत्नी की मौत हो गई।

    मजिस्ट्रेट ने पुलिस द्वारा सौंपी गई 'की गई कार्रवाई की रिपोर्ट' (Action Taken Report) पर विचार करने के बाद FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार किया। मजिस्ट्रेट ने पाया कि उस व्यक्ति को उन लोगों की पहचान पता थी, जिन पर आरोप लगाए गए और सबूत भी उसकी जानकारी में थे। इसलिए मजिस्ट्रेट ने उसे समन जारी करने से पहले के सबूत (Pre-Summoning Evidence) पेश करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

    याचिकाकर्ता ने इस आदेश को सेशंस कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन उसकी रिविज़न याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उसने BNSS की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया। उसने तर्क दिया कि BNSS की धारा 438 के तहत रिविज़न का अधिकार क्षेत्र और BNSS की धारा 528 के तहत निहित अधिकार क्षेत्र अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं।

    इस चुनौती को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने BNSS की धारा 438(3) और धारा 528 के बीच के आपसी संबंध की जांच की। कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 438(3), जो पहले की CrPC की धारा 397(3) जैसी ही है, किसी पार्टी को हाईकोर्ट या सेशंस कोर्ट में जाने के बाद दोबारा रिविज़न की अर्ज़ी दाखिल करने से रोकती है।

    कोर्ट ने 'एक्सक्लूसिव कैपिटल लिमिटेड बनाम स्टेट, गवर्नमेंट ऑफ़ NCT दिल्ली (2026)' मामले में अपने फैसले का हवाला देते हुए कहा,

    "जिस चीज़ पर कानून ने साफ़ तौर पर रोक लगाई, उसे 'इनहेरेंट पावर्स' (निहित शक्तियों) का इस्तेमाल करके पिछले दरवाज़े से आने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि इसमें एक अपवाद भी है, जब हाईकोर्ट को यह यकीन हो जाए कि बहुत बड़ा अन्याय हुआ, न्याय प्रक्रिया में भारी गड़बड़ी हुई, प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल हुआ या ऐसी ही कोई असाधारण स्थिति है।

    कोर्ट ने देखा कि मुख्य सवाल यह था कि क्या रिविज़न याचिका खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता के पास कोई रास्ता नहीं बचा।

    इसका जवाब 'नहीं' में देते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की शिकायत अभी भी मजिस्ट्रेट के पास लंबित है और वह समन जारी होने से पहले सबूत पेश कर सकता है।

    इसलिए कोर्ट ने माना कि यह मामला "सबसे दुर्लभ मामलों" (Rarest of Rare Case) की श्रेणी में नहीं आता, जिसके लिए 'इनहेरेंट पावर्स' का इस्तेमाल करने की ज़रूरत हो।

    Case title: Anil Ahluwalia v. State NCT of Delhi

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