लंबे समय तक जेल में रहने के बाद सिर्फ़ विदेशी होने या भागने के जोखिम के आधार पर UAPA के तहत ज़मानत से इनकार नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
18 Sept 2026 6:28 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इस बात से कि कोई आरोपी विदेशी नागरिक है या उसके भागने का जोखिम है, UAPA के तहत उसे ज़मानत देने से इनकार करना सही नहीं ठहराया जा सकता, खासकर तब जब वह व्यक्ति लंबे समय से जेल में हो। [2026 LiveLaw (Del) 864]
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने ब्रिटिश नागरिक जगतार सिंह जोहल को ज़मानत देते हुए यह टिप्पणी की। जोहल हत्या और UAPA के सात मामलों में आठ साल से ज़्यादा समय से हिरासत में हैं।
कोर्ट ने कहा कि भागने के जोखिम से जुड़ी चिंताओं को ज़मानत की उचित शर्तों के ज़रिए दूर किया जा सकता है, सिर्फ़ इसी आधार पर अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"ASG की इस दलील के बारे में कि अपीलकर्ता विदेशी नागरिक है और उसके भागने का जोखिम है, हमारी राय है कि सिर्फ़ इस आधार पर अपीलकर्ता की आज़ादी को सीमित नहीं किया जा सकता। इसके बजाय, हम ऐसी शर्तें लगाएंगे जिनसे यह पक्का हो सके कि वह भागने का जोखिम न बने।"
बेंच ने जोहल की उन अपीलों को मंज़ूरी दी, जिनमें उन्होंने ट्रायल कोर्ट के ज़मानत न देने के आदेशों को चुनौती दी थी। उन पर पंजाब के लुधियाना और जालंधर ज़िलों में 2016-2017 के दौरान कई टारगेटेड हत्याओं में शामिल होने का आरोप है।
NIA का मामला यह है कि जिन घटनाओं में जोहल और अन्य आरोपी शामिल हैं, वे खास तौर पर पंजाब में कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करने के लिए की गईं। उसने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी खालिस्तान लिबरेशन फोर्स (KLF) की रची गई साज़िश का हिस्सा थे, जिसका जोहल भी सदस्य है।
जोहल को राहत देते हुए कोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) के तहत ज़मानत पर सख़्त पाबंदियों और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत आज़ादी और तेज़ी से सुनवाई की संवैधानिक गारंटी के बीच संतुलन पर विचार किया।
कोर्ट ने गौर किया कि जोहल आठ साल से ज़्यादा समय से हिरासत में हैं और 40 गवाहों से पूछताछ हो चुकी है, जबकि 123 गवाहों से पूछताछ अभी बाकी है, जिनमें से लगभग 63 गवाह कॉमन (साझा) हैं। कोर्ट ने देखा कि ट्रायल के जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है। साथ ही, यह भी बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद ट्रायल की रफ़्तार में कोई खास तेज़ी नहीं आई।
इसके अलावा, कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि पंजाब की एक ट्रायल कोर्ट ने UAPA मामले में जोहल को बरी कर दिया, और NIA ने इस फ़ैसले को चुनौती नहीं दी थी।
इस पर बेंच ने कहा कि भले ही ASG की यह बात सही हो कि बरी करने का आदेश 'रेस ज्यूडिकाटा' (एक ही मामले पर दोबारा सुनवाई न होने का सिद्धांत) के तौर पर लागू नहीं हो सकता, लेकिन हकीकत यह है कि उन्हीं आरोपों के आधार पर जोहल को मौजूदा मामलों में साज़िश में शामिल होने का आरोपी बनाया जा रहा है।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए कम-से-कम अपीलकर्ता को ज़मानत पर रिहा करने के मामले में इस आदेश का काफ़ी असरदार महत्व होगा।"
गवाहों को डराने-धमकाने के बारे में NIA की चिंताओं पर कोर्ट ने कहा कि धमकी के आरोपों के मामले में, जब तक ऐसा कोई ठोस सबूत न हो, जिससे यह साबित हो कि धमकी जोहल ने दी थी या उसके कहने पर दी गई, तब तक ज़मानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता—खासकर तब जब आरोपी लंबे समय से जेल में हो।
कोर्ट ने कहा,
"ऊपर बताई गई बातों को देखते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेशों को बरकरार नहीं रखा जा सकता और उन्हें रद्द किया जाता है। अपीलकर्ता को ऊपर बताए गए RC मामलों में ज़मानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है..."
बेंच ने जोहल को निर्देश दिया कि वह अपना पासपोर्ट जमा करे, सिर्फ़ एक मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल करे, अपना पता और संपर्क की जानकारी दे, ट्रायल कोर्ट में नियमित रूप से पेश हो और कार्यवाही में देरी न करने का हलफ़नामा दे।
कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि ज़मानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर प्रॉसिक्यूशन ज़मानत रद्द करने की मांग कर सकता है।
Title: JAGTAR SINGH JOHAL @ JAGGI v. NIA

