आरोपी यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसकी गिरफ़्तारी की जानकारी परिवार को नहीं दी गई, जबकि उसने खुद वकील को जानकारी देने का विकल्प चुना: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

9 May 2026 6:21 PM IST

  • आरोपी यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसकी गिरफ़्तारी की जानकारी परिवार को नहीं दी गई, जबकि उसने खुद वकील को जानकारी देने का विकल्प चुना: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में ज़मानत के आवेदक की इस दलील को खारिज किया कि उसकी गिरफ़्तारी गैर-कानूनी थी, क्योंकि उसके परिवार वालों को इसकी जानकारी नहीं दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह आरोपी पर ही निर्भर करता है कि वह किसे अपनी गिरफ़्तारी के बारे में सूचित करवाना चाहता है।

    जस्टिस स्वरणा कांता शर्मा ने कहा कि आवेदक ने अपने वकील को सूचित करने का विकल्प चुना था, जिसका पालन जाँच अधिकारी (I.O.) ने किया था; इसलिए अब वह नियमों का पालन न होने का आरोप नहीं लगा सकता।

    इस प्रकार, कोर्ट ने उस व्यक्ति की ज़मानत याचिका खारिज की, जिस पर अपनी नाबालिग बेटी का यौन शोषण करने का आरोप है। यह मामला IPC की धारा 376, 354 और 506; भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 75; और POCSO Act की धारा 6 और 12 के तहत दर्ज किया गया।

    आरोपी ने कोर्ट के सामने यह दलील दी थी कि उसे बिना गिरफ़्तारी के उचित लिखित कारणों की जानकारी दिए गिरफ्तार किया गया, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 47 के तहत अनिवार्य है। उसने यह भी कहा कि उसके परिवार वालों को उसकी गिरफ़्तारी के बारे में सूचित नहीं किया गया।

    इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि गिरफ़्तारी की प्रक्रिया से जुड़े कानूनी सुरक्षा उपायों का प्रथम दृष्टया पालन किया गया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सही ही कहा था कि आरोपी को खुद ही उस व्यक्ति का नाम बताना चाहिए, जिसे वह अपनी गिरफ़्तारी के बारे में सूचित करवाना चाहता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "मौजूदा मामले में आवेदक ने अपने वकील को सूचित करने का विकल्प चुना था, जिसका पालन I.O. ने विधिवत किया। इस संबंध में किसी भी तरह की देरी को दर्शाने वाला कोई भी सबूत मौजूद नहीं है।"

    कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि जब आरोपी को न्यायिक हिरासत के लिए पेश किया गया, तब उसका वकील वहाँ मौजूद था। साथ ही ट्रायल कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि आरोपी ने स्वीकार किया कि उसे गिरफ़्तारी के कारणों की जानकारी दी गई थी और उसे उन कारणों की एक प्रति भी मिली थी।

    तदनुसार, कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 47 या संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन होने का कोई भी सबूत मौजूद नहीं है।

    मामले के गुण-दोष के आधार पर कोर्ट ने आरोपी को ज़मानत देने से इनकार किया। कोर्ट ने नाबालिग पीड़िता द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों पर गौर किया, जिनमें उसके सगे पिता द्वारा कई वर्षों तक बार-बार यौन शोषण किए जाने के आरोप शामिल थे।

    Case title: Vishwas Patil v. State

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