एग्जीक्यूटिंग कोर्ट फ़ाइनल डिक्री में शामिल न की गई पिछली सैलरी नहीं दे सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Shahadat
1 Sept 2026 8:14 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट डिक्री से आगे नहीं जा सकता और पिछली सैलरी (बैक वेजेज़) नहीं दे सकता, अगर उस फ़ैसले और डिक्री में ऐसी कोई राहत नहीं दी गई, जिसे लागू किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के पास न तो डिक्री को समझाने का अधिकार है और न ही उससे आगे जाने का अधिकार क्षेत्र।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (CISF) कमांडेंट की रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इसमें एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें प्रतिवादी/वादी को पिछली सैलरी देने का निर्देश दिया गया था। प्रतिवादी/वादी, जो CISF में कॉन्स्टेबल के तौर पर काम कर रहा था, उसे 02.03.1983 को नौकरी से निकाल दिया गया।
इसके बाद उसने एक सिविल केस दायर किया, जिसमें सिविल जज ने उसके पक्ष में फ़ैसला सुनाया। पहली अपीलीय अदालत ने फ़ैसले और डिक्री को पलट दिया, जिसके बाद प्रतिवादी ने हाईकोर्ट में दूसरी अपील की, जिसे आंशिक रूप से मंज़ूर कर लिया गया। इसके बाद प्रतिवादी ने नौकरी से निकाले जाने की तारीख से लेकर अपनी रिटायरमेंट तक की पिछली सैलरी के लिए एक एग्जीक्यूशन एप्लीकेशन दायर की।
याचिकाकर्ता ने कहा कि चूंकि दूसरी अपील में हाईकोर्ट ने पिछली सैलरी के लिए कोई राहत नहीं दी, इसलिए एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के पास एग्जीक्यूशन की कार्यवाही में ऐसी राहत देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है।
कोर्ट ने देखा कि दूसरी अपील में उसके द्वारा दिए गए फ़ैसले और डिक्री में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि प्रतिवादी पिछली सैलरी का हकदार होगा। बल्कि, उसे पे स्केल (वेतनमान) के सबसे निचले स्तर पर रखने की सज़ा दी गई।
कोर्ट ने कहा,
"चूंकि दूसरी अपील में इस कोर्ट ने प्रतिवादी/वादी पर लगाई गई सज़ा पर खास तौर पर विचार किया और ऊपर बताई गई बदली हुई सज़ा दी, इसलिए कोर्ट प्रतिवादी/वादी के वकील की इस दलील को मानने के लिए तैयार नहीं है कि इस कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई पिछली सैलरी को मंज़ूरी दी थी।"
कोर्ट ने यह भी देखा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई डिक्री को पहली अपीलीय अदालत ने रद्द कर दिया। उसके बाद हाईकोर्ट ने दूसरी अपील में सज़ा पर विचार किया और उसमें बदलाव किया। हालांकि बदली हुई सज़ा से प्रतिवादी को आर्थिक फ़ायदे मिले, लेकिन उसके पक्ष में पिछली सैलरी के भुगतान का कोई खास निर्देश नहीं दिया गया।
कोर्ट ने कहा,
“SA नंबर 365/1996 में इस कोर्ट ने कोई बकाया वेतन नहीं दिया था। इसलिए, एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के पास न तो इस कोर्ट के आदेश (डिक्री) की व्याख्या करने का अधिकार था और न ही आदेश से आगे जाने का अधिकार क्षेत्र था।”
इसके अनुसार, कोर्ट ने माना कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट द्वारा 12.01.2024 को पारित आदेश कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है। इसलिए इसने एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के 12.01.2024 के आदेश को रद्द कर दिया और याचिका को मंज़ूरी दी।
Case Title: Central Industrial Security Force Commandant KSTPP Korba v. Ram Karan Sharma [WP227 No. 163 of 2024]


