शादी से इनकार करने पर लगातार पीछा करना और जान से मारने की धमकी देना आत्महत्या के लिए उकसाने जैसा: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Shahadat

24 July 2026 9:27 PM IST

  • शादी से इनकार करने पर लगातार पीछा करना और जान से मारने की धमकी देना आत्महत्या के लिए उकसाने जैसा: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि शादी से इनकार करने पर लगातार पीछा करना, परेशान करना, शादी के लिए दबाव डालना और बार-बार जान से मारने की धमकी देना, आत्महत्या के लिए उकसाने का एक "सक्रिय कार्य" (positive act) है, जो IPC की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध बनाता है। कोर्ट ने पाया कि आरोपी का व्यवहार साफ तौर पर लगातार उकसाने वाला था, न कि सिर्फ़ परेशान करने वाली अलग-अलग घटनाएं।

    जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास उस अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जो राज्य सरकार ने प्रतिवादी को बरी किए जाने के खिलाफ़ दायर की। प्रतिवादी पर IPC की धारा 306 के तहत एक युवती को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, प्रतिवादी ने मृतका को शादी के लिए लगातार परेशान किया और इनकार करने पर उसे और उसकी माँ को जान से मारने की धमकी दी।

    आरोप है कि लगातार परेशान किए जाने से मृतका गंभीर मानसिक तनाव में आ गई और आखिरकार उसने आत्महत्या कर ली। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को इस आधार पर बरी कर दिया था कि अभियोजन पक्ष उकसाने की बात साबित करने में नाकाम रहा और कथित सुसाइड नोट लिखने वाले की पहचान के लिए किसी हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से जाँच नहीं करवाई।

    आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े कानून की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि IPC की धारा 306 के तहत उकसाने या जानबूझकर मदद करने के सक्रिय कार्य (positive act) का सबूत ज़रूरी है, साथ ही इसके पीछे गलत इरादा (mens rea) भी होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ परेशान करना काफी नहीं है, लेकिन लगातार ऐसा व्यवहार जिससे पीड़ित को लगे कि आत्महत्या ही एकमात्र रास्ता है, उकसाने के बराबर हो सकता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "...अगर आरोपी ने अपनी बातों या हरकतों से मृतका को तब तक परेशान या चिढ़ाया, जब तक कि उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी या उकसावे में नहीं आ गई तो यह मामला आत्महत्या के लिए उकसाने का हो सकता है।"

    इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि मृतका की माँ के बयान से लगातार यह साबित हुआ कि प्रतिवादी ने बार-बार मृतका का पीछा किया और उसे परेशान किया, शादी से इनकार करने पर उसे और उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दी, और पुलिस व ग्राम पंचायत के दखल के बावजूद अपना व्यवहार जारी रखा। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि प्रतिवादी की हरकतों की वजह से मृतका ने पहले भी अपनी कलाई काटकर आत्महत्या की कोशिश की थी।

    कोर्ट ने माना कि इन सबूतों से साफ पता चलता है कि यह लगातार उकसाने वाला व्यवहार था, न कि सिर्फ़ परेशान करने वाली अलग-अलग घटनाएं। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने सुसाइड नोट के मामले में हैंडराइटिंग एक्सपर्ट के सबूत न होने पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देकर गंभीर गलतियाँ की थीं।

    कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक्सपर्ट की राय सिर्फ़ दूसरे सबूतों की पुष्टि करने वाली होती है और यह आरोपी के आचरण को साबित करने वाले सीधे और भरोसेमंद सबूतों से ज़्यादा अहम नहीं हो सकती। कोर्ट ने आगे कहा कि सभी सबूतों को मिलाकर देखने पर प्रतिवादी के कामों और मृतक की आत्महत्या के बीच सीधा संबंध साबित होता है, और ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष गलत था।

    कोर्ट ने कहा कि अपीलीय अदालत बरी करने के फैसले को पलट सकती है, अगर ट्रायल कोर्ट ने अहम सबूतों को नज़रअंदाज़ किया हो और रिकॉर्ड से केवल दोषी होने का ही उचित निष्कर्ष निकलता हो। कोर्ट ने माना कि मौजूदा मामला इन शर्तों को पूरा करता है।

    इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने बरी करने का फैसला रद्द किया, प्रतिवादी को IPC की धारा 306 के तहत सज़ा के योग्य अपराध के लिए दोषी ठहराया, और निर्देश दिया कि सज़ा के सवाल पर सुनवाई के लिए मामले को अलग से लिस्ट किया जाए।

    Case Title: State of Chhattisgarh v. Mohd. Seraj [ACQA No. 96 of 2020]

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