SC/ST एक्ट में अपराध साबित करने के लिए वैध जाति प्रमाणपत्र अनिवार्य: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Praveen Mishra
20 April 2026 5:30 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि अभियोजन यह साबित करे कि पीड़ित अनुसूचित जाति/जनजाति से संबंधित है और आरोपी उस वर्ग से नहीं है।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने स्पष्ट किया कि इसके लिए वैध जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य (sine qua non) है।
मामला एक अपील से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सरकारी जमीन पर दुकान निर्माण को लेकर विवाद के दौरान आरोपियों ने उसे जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी।
इस आधार पर आईपीसी की धाराओं 294, 323, 506/34 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को धारा 294, 506 आईपीसी और 3(1)(r) के तहत दोषी ठहराया था।
हाईकोर्ट में अपील करते हुए आरोपियों ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता का जाति प्रमाणपत्र केवल तहसीलदार द्वारा जारी अस्थायी प्रमाणपत्र था, जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी नहीं था और इसलिए वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि शिकायतकर्ता किसी जाति से है, बल्कि इसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से सिद्ध करना जरूरी है। चूंकि इस मामले में वैध जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए धारा 3(1)(r) के तहत अपराध सिद्ध नहीं हुआ और इस धारा में दी गई सजा को रद्द कर दिया गया।
हालांकि, अदालत ने गवाहों के बयानों के आधार पर आईपीसी की धारा 294 (अश्लील भाषा के उपयोग) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा। वहीं, धारा 506(2) के तहत आपराधिक धमकी के आरोप को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में खारिज कर दिया गया।
सजा के प्रश्न पर अदालत ने ध्यान दिया कि घटना को 21 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और आरोपी पहले ही एक दिन जेल में रह चुके हैं।
इसलिए छह महीने की सजा को घटाकर पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया गया और जुर्माना ₹500 से बढ़ाकर ₹2000 प्रत्येक कर दिया गया। इस प्रकार, अदालत ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया।

