छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्टेट फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार की नियुक्ति रद्द की, कहा - सरकार फार्मेसी एक्ट के तहत सीधे नियुक्ति नहीं कर सकती

Shahadat

17 March 2026 7:26 PM IST

  • छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्टेट फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार की नियुक्ति रद्द की, कहा - सरकार फार्मेसी एक्ट के तहत सीधे नियुक्ति नहीं कर सकती

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार के तौर पर अश्विनी गुरदेकर की नियुक्ति रद्द की। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि फार्मेसी एक्ट, 1948 की धारा 26 के तहत रजिस्ट्रार की नियुक्ति स्टेट फार्मेसी काउंसिल द्वारा राज्य सरकार की पहले से मंज़ूरी लेकर की जानी चाहिए, न कि सीधे सरकार द्वारा।

    जस्टिस पार्थ प्रतीक साहू रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें 'क्वो वारंटो' (Quo Warranto) रिट जारी करने की मांग की गई। इस याचिका में प्रतिवादी नंबर 4 (अश्विनी गुरदेकर) की छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार पद पर हुई नियुक्ति को चुनौती दी गई।

    याचिकाकर्ता ने बताया कि छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल का गठन 09.10.2003 के आदेश द्वारा फार्मेसी एक्ट, 1948 के प्रावधानों के तहत किया गया। यह तर्क दिया गया कि काउंसिल का कामकाज 'मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ औषध निर्माण शाला परिषद नियम, 1978' द्वारा नियंत्रित होता है, जिसे 1948 के एक्ट के तहत बनाया गया।

    1978 के नियमों के नियम 2 का हवाला देते हुए यह बताया गया कि "रजिस्ट्रार" शब्द का अर्थ उस रजिस्ट्रार से है, जिसकी नियुक्ति फार्मेसी एक्ट की धारा 26 के तहत की गई हो। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि धारा 26 में साफ तौर पर कहा गया कि रजिस्ट्रार की नियुक्ति काउंसिल द्वारा, राज्य सरकार की पहले से मंज़ूरी लेकर की जाएगी। याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि 14 मार्च, 2024 के आदेश के तहत प्रतिवादी नंबर 4 की नियुक्ति, कानूनी प्रावधानों के विपरीत थी। याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रतिवादी नंबर 4 डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल हॉस्पिटल, रायपुर में स्टोर कीपर के तौर पर काम कर रहा था और उसके पास क्लास-II अधिकारी का पद नहीं था।

    यह तर्क भी दिया गया कि यह नियुक्ति काउंसिल की किसी भी प्रक्रिया के तहत नहीं की गई, बल्कि सीधे राज्य सरकार द्वारा जारी की गई; जबकि राज्य सरकार के पास इस तरह की नियुक्ति करने का अधिकार क्षेत्र नहीं था। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने 1978 के नियमों के नियम 96 का हवाला देते हुए कहा कि रजिस्ट्रार काउंसिल का एक पूर्णकालिक वेतनभोगी अधिकारी होना चाहिए। आम तौर पर रजिस्ट्रार राज्य सरकार का कोई रिटायर मेडिकल अधिकारी होना चाहिए। याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने यह दलील दी कि प्रतिवादी नंबर 4 को रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्त नहीं किया गया, बल्कि उन्हें केवल इस पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। यह तर्क भी दिया गया कि यह रिट याचिका किसी गुप्त उद्देश्य से दायर की गई, क्योंकि प्रतिवादी नंबर 4 द्वारा उठाए गए कदमों के परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता को पहले ही परिषद की सदस्यता से हटा दिया गया।

    हाईकोर्ट ने फार्मेसी एक्ट, 1948 की धारा 26 की रूपरेखा की जांच की, जो राज्य फार्मेसी परिषद के कर्मचारियों और रजिस्ट्रार की नियुक्ति से संबंधित है। न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि यह वैधानिक प्रावधान नियुक्ति के लिए दो-चरणों वाली प्रक्रिया की परिकल्पना करता है: पहला, रजिस्ट्रार की नियुक्ति के संबंध में राज्य परिषद का निर्णय; और दूसरा, राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना।

    न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि इस प्रावधान के तहत राज्य सरकार की भूमिका पर्यवेक्षी प्रकृति की है और केवल स्वीकृति प्रदान करने तक ही सीमित है; वह स्वयं को 'नियुक्ति प्राधिकारी' की भूमिका में नहीं रख सकती। न्यायालय ने इसके अतिरिक्त, वर्ष 1978 के नियमों के 'नियम 96' पर भी विचार किया, जिसमें यह प्रावधान है कि रजिस्ट्रार परिषद का एक पूर्णकालिक वेतनभोगी अधिकारी होगा और सामान्यतः उसे राज्य सरकार का कोई रिटायर मेडिकल ऑफिसर होना चाहिए। न्यायालय ने यह उल्लेख किया कि ये नियम न केवल पद की प्रकृति को निर्धारित करते हैं, बल्कि नियुक्ति के लिए आवश्यक पात्रता मानदंडों को भी स्पष्ट करते हैं।

    हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्णय दिया:

    “प्रस्तुत मामले में दिनांक 14.03.2024 के आदेश (संलग्नक P-1) के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि प्रतिवादी नंबर 4 को रजिस्ट्रार के पद का प्रभार राज्य सरकार द्वारा सौंपा गया। प्रतिवादियों द्वारा अभिलेख पर ऐसा कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह सिद्ध हो सके कि प्रभार सौंपने की यह कार्रवाई परिषद के किसी प्रस्ताव अथवा निर्णय के अनुपालन में की गई। ऐसे किसी भी साक्ष्य के अभाव में यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार ने सीधे तौर पर रजिस्ट्रार के पद का प्रभार सौंपने का आदेश जारी किया है। यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि जब कोई अधिनियम (Statute) यह निर्धारित करता है कि किसी विशिष्ट कार्य को किसी विशेष रीति से ही संपन्न किया जाना चाहिए तो उस कार्य को अनिवार्यतः उसी रीति से किया जाना चाहिए और किसी अन्य रीति से नहीं। वैधानिक रूप से निर्धारित प्रक्रिया से किसी भी प्रकार का विचलन उस कार्रवाई को विधिक रूप से अस्थिर (legally unsustainable) बना देता है।”

    न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्ति करने अथवा उस पद के लिए आवश्यक व्यवस्था करने की वैधानिक शक्ति स्वयं 'राज्य फार्मेसी परिषद' में ही निहित है। अदालत ने यह पाया कि फार्मेसी अधिनियम, 1948 की धारा 26 की वैधानिक योजना के तहत राज्य सरकार नियुक्ति प्राधिकारी की भूमिका नहीं निभा सकती। अदालत ने यह भी नोट किया कि प्रतिवादी नंबर 4, डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल, रायपुर में स्टोर कीपर के रूप में कार्यरत था और ऐसा कोई प्रमाण नहीं था कि वह 1978 के नियमों के नियम 96 के तहत निर्धारित आवश्यकताओं को पूरा करने वाले किसी पद पर आसीन था।

    तदनुसार, अदालत ने दिनांक 14.03.2024 का आदेश रद्द किया, जिसके द्वारा प्रतिवादी नंबर 4 को छत्तीसगढ़ राज्य फार्मेसी परिषद के रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्त किया गया।

    Case Title: Dr. Rakesh Gupta v. The State of Chhattisgarh & Ors.

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