एससी आयोग आपराधिक आरोप तय या अपराध साबित घोषित नहीं कर सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Amir Ahmad
23 Sept 2026 5:05 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य अनुसूचित जाति आयोग किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक आरोप को साबित घोषित नहीं कर सकता और न ही इस आधार पर FIR दर्ज करने की सिफारिश कर सकता है कि संबंधित अपराध अदालत में साबित हो चुका है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अपराध के साबित होने का निर्धारण आपराधिक अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
याचिका में राज्य अनुसूचित जाति आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें आयोग ने याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(1) के तहत लगाए गए आरोप को साबित मानते हुए FIR दर्ज करने की सिफारिश की थी।
मामला एक छात्रा की शिकायत से जुड़ा है। छात्रा ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता उसे एक नकल के मामले में दबाव डाल रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन्हीं आरोपों से संबंधित शिकायत की पहले जांच हो चुकी है और जांच में शिकायत को झूठा पाया गया। इसके बावजूद अनुसूचित जाति आयोग ने शिकायत और उपलब्ध सामग्री पर विचार करते हुए उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की सिफारिश की।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि आयोग ने केवल सिफारिश करने की आड़ में 1989 के अधिनियम की धारा 3(1) के तहत लगाए गए आरोप को स्पष्ट रूप से साबित घोषित कर दिया। इस तरह आयोग ने आपराधिक अदालत के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया।
वहीं आयोग की ओर से कहा गया कि उसने केवल शिकायत और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर विचार करने के बाद FIR दर्ज करने की सिफारिश की थी।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भवानी प्रसाद जेना बनाम संयोजक सचिव, उड़ीसा राज्य महिला आयोग मामले के फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया कि आयोग शिकायतें प्राप्त करने, शिकायतों की जांच करने और राहत के लिए संबंधित अधिकारियों के समक्ष मामला उठाने का अधिकार रखता है, लेकिन उसे पक्षकारों के अधिकारों का न्यायनिर्णयन या निर्धारण करने का अधिकार नहीं दिया गया।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग मामले का भी उल्लेख किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आयोग को दी गई सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां केवल उन्हीं मामलों तक सीमित हैं, जिनका कानून में विशेष रूप से उल्लेख किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि आयोग को दस्तावेज मंगाने, साक्ष्य प्राप्त करने और तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज करने की शक्ति हो सकती है, लेकिन इन शक्तियों के आधार पर वह ऐसा आदेश पारित नहीं कर सकता जिससे पक्षकारों के अधिकारों का न्यायिक रूप से निर्धारण हो। आयोग की भूमिका अधिकतम सिफारिश तक सीमित रहती है।
पीठ ने कहा कि मौजूदा मामले में आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा पार कर दी, क्योंकि उसने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से यह दर्ज कर दिया कि 1989 के अधिनियम की धारा 3(1) के तहत याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाया गया आरोप साबित है।
कोर्ट ने कहा कि आरोप का इस तरह साबित होना आपराधिक अदालत के अधिकार क्षेत्र का विषय है और आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
हाईकोर्ट ने आयोग के इस निष्कर्ष को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर माना और याचिकाकर्ता की रिट याचिका स्वीकार की।

