कोर्ट परिसर गरिमामय और पवित्र स्थल हैं, उन्हें प्रदर्शन का मंच नहीं बनाया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

  • कोर्ट परिसर गरिमामय और पवित्र स्थल हैं, उन्हें प्रदर्शन का मंच नहीं बनाया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में अदालत कक्ष के भीतर नारेबाजी करने, एक आरोपी को धमकाने, पुलिसकर्मियों से हाथापाई करने और उनके वैधानिक कर्तव्यों में बाधा डालने के आरोप में दो व्यक्तियों को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है।

    चीफ़ जस्टिस रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने इस घटना को अत्यंत गंभीर मानते हुए स्पष्ट किया कि न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालने वाली किसी भी अवैध गतिविधि को हल्के में नहीं लिया जा सकता। न्यायालय ने कहा—

    “न्यायालय परिसर, जिसमें अदालत कक्ष और उसके आसपास का क्षेत्र शामिल है, न्याय के प्रशासन के लिए समर्पित तटस्थ, गरिमापूर्ण और पवित्र स्थान होते हैं। इन्हें किसी भी प्रकार के विरोध, प्रदर्शन या जन-आंदोलन के मंच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत परिसर में कोई भी अवैध जमावड़ा न केवल न्यायिक कार्यवाही को बाधित करता है, बल्कि वादकारियों, अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करता है। ऐसे कृत्यों को यदि सहन किया जाए तो यह न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास कमजोर करेगा और अराजकता को बढ़ावा देगा।”

    अभियोजन के अनुसार, 15 नवंबर 2025 को एक कथावाचक ने अपने धार्मिक कार्यक्रम में सतनामी समुदाय के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इस पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का मामला दर्ज कर उक्त कथावाचक को अदालत में पेश किया गया।

    आरोप है कि जब पुलिस कर्मी अपना कर्तव्य निभा रहे थे, तब वर्तमान आवेदकों सहित कुछ अन्य लोगों ने पुलिस को रोकने का प्रयास किया, कथावाचक को गालियां दीं और अदालत परिसर में नारेबाजी की। इसके आधार पर आवेदकों सहित अन्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 191(2) (दंगा), 221 (लोक सेवक के कार्य में बाधा), 132 (लोक सेवक पर हमला), 296 (अश्लील कृत्य), 351(2) (आपराधिक धमकी) और 299 (धार्मिक भावनाएं आहत करना) के तहत एफआईआर दर्ज की गई। गिरफ्तारी की आशंका में उन्होंने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की।

    आवेदकों की ओर से दलील दी गई कि वे निजी कार्य से अदालत परिसर के पास गए थे और उन्होंने न तो किसी विरोध प्रदर्शन में भाग लिया और न ही पुलिस को रोका। वहीं राज्य सरकार की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि आवेदक घटना में शामिल थे और उनके आपराधिक पूर्ववृत्त (क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स) भी हैं।

    न्यायालय ने तथ्यों और आवेदकों के आपराधिक रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति या समूह विरोध या शिकायत के नाम पर कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता। कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि कथित घटनाएं न्यायालय परिसर के भीतर हुईं, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

    कोर्ट ने कहा—

    “इस मामले में आरोप हैं कि एक भीड़ ने अदालत परिसर में अवैध रूप से प्रवेश किया, नारे लगाए, आरोपी को धमकाया और अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे पुलिसकर्मियों को रोका। प्रथम दृष्टया यह आचरण अत्यंत गंभीर है, विशेष रूप से जब यह न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को बाधित करने से जुड़ा हो। यह तथ्य कि यह घटना ऐसे स्थान पर हुई जहाँ अनुशासन, व्यवस्था और कानून के शासन का सम्मान सर्वोपरि होता है, इसकी गंभीरता को और बढ़ाता है।”

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि आवेदकों को अग्रिम जमानत देकर संरक्षण देना उचित नहीं है, और इस प्रकार उनकी याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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