सोशल मीडिया वीडियो की सत्यता साबित किए बिना विभागीय कार्रवाई नहीं हो सकती: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Praveen Mishra
4 Aug 2026 5:27 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी विभागीय जांच (Departmental Enquiry) के निष्कर्ष केवल सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो पर आधारित हों और उस वीडियो का स्रोत, प्रामाणिकता तथा कानूनी रूप से प्रमाणित होने का तरीका स्थापित न किया गया हो, तो ऐसे निष्कर्ष टिक नहीं सकते।
चीफ़ रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए जेल प्रहरी (Prison Guard) को सेवा से हटाने का आदेश रद्द करने वाले एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखा।
मामले में जेल प्रहरी पर आरोप था कि वह मेडिकल जांच के लिए ले जाए जा रहे एक विचाराधीन कैदी (Undertrial Prisoner) के परिजनों के साथ रेस्तरां में घूमता दिखाई दिया और कैदी को समय पर जेल वापस नहीं लाया। विभागीय जांच में आरोपों का मुख्य आधार सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो था।
हाईकोर्ट ने कहा कि विभाग यह साबित नहीं कर सका कि वीडियो किसने बनाया, कब रिकॉर्ड किया गया, उसका स्रोत क्या था और उसकी प्रामाणिकता कैसे स्थापित हुई। जांच के दौरान वीडियो रिकॉर्ड करने वाले या उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति का बयान भी दर्ज नहीं किया गया।
दूसरे आरोप, यानी कैदी को देर से जेल लाने के संबंध में भी अदालत ने कहा कि कर्मचारी का यह स्पष्टीकरण कि डॉक्टर ने जांच रिपोर्ट आने तक कैदी को अस्पताल में रखने की सलाह दी थी, विभाग खंडित नहीं कर सका।
अदालत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के तहत हाईकोर्ट सामान्यतः साक्ष्यों की पर्याप्तता की जांच नहीं करता, लेकिन यदि विभागीय निष्कर्ष किसी वैध कानूनी साक्ष्य (Legally Admissible Evidence) पर आधारित ही न हों, तो हस्तक्षेप करना आवश्यक हो जाता है।
इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने विभागीय और अपीलीय प्राधिकारी के आदेशों को अस्थिर (Unsustainable) मानते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।


