पत्नी की लिंक्डइन प्रोफाइल 'पर्याप्त आय' का सबूत नहीं, इससे वह गुजारा-भत्ता पाने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाती: बेंगलुरु कोर्ट
Shahadat
3 Nov 2026 8:27 PM IST

बेंगलुरु सेशन कोर्ट ने कहा कि अगर कोई पति अपनी अलग रह रही पत्नी की लिंक्डइन प्रोफाइल या फेसबुक प्रोफाइल की तस्वीरों को इस बात के सबूत के तौर पर पेश करता है कि वह किसी प्राइवेट कंपनी में काम कर रही है, तो यह दावा करने के लिए काफी नहीं है कि उसके पास पर्याप्त आय है और इसलिए वह पति से गुजारा-भत्ता पाने की हकदार नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि महिला ने कोई नौकरी शुरू की है तो भी यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि उसके पास खुद का और अपने बच्चे का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त आय है।
बेंगलुरु के एडिशनल सिटी सिविल एंड सेशन जज मोहन प्रभु एम.ए. की अदालत ने कहा:
"मैंने दोनों पक्षों की दलीलों को समझा है और पूरे रिकॉर्ड को देखा है। यह बात साफ है कि याचिका दायर करने की तारीख पर याचिकाकर्ता (पत्नी) बेरोजगार थी और उसके पास कोई नौकरी नहीं थी। प्रतिवादी (पति) ने अपनी संपत्ति और देनदारियों के विवरण में भी कहीं यह नहीं बताया कि पत्नी के पास कोई नौकरी है, वह कोई कमाई कर रही है, या उसके पास आय का कोई अन्य स्रोत है। इसलिए यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता बेरोजगार थी।"
ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड से पता चलता है कि बहस के दौरान, प्रतिवादी के वकील ने कुछ तस्वीरें, लिंक्डइन प्रोफाइल और फेसबुक प्रोफाइल की तस्वीरें पेश कीं और दावा किया कि याचिकाकर्ता कहीं काम कर रही है। हालांकि, वकील ने यह नहीं बताया कि प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में काम करके याचिकाकर्ता की असल कमाई कितनी है। मजिस्ट्रेट ने सही कहा कि बहस के दौरान प्रतिवादी के वकील द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अगर यह मान भी लिया जाए कि याचिकाकर्ता ने 2023 के बाद कोई नौकरी शुरू की है तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसके पास खुद का और अपने बच्चे का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त आय है।"
कोर्ट एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई कर रही थी, जिसमें पत्नी ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश में बदलाव की मांग करते हुए अपील दायर की थी। उसने अपनी आर्थिक निर्भरता और जीवनशैली को देखते हुए 1 लाख रुपये प्रति माह के गुजारे-भत्ते की मांग की थी। इसके अलावा, उसने अपने नाबालिग बच्चे के लिए 15,000 रुपये प्रति माह का गुजारा-भत्ता और सालाना 1,60,000 रुपये की शिक्षा संबंधी खर्च की मांग भी की थी। जैसा कि ट्रायल कोर्ट पहले ही निर्देश दे चुका है। महिला ने 'घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम' की धारा 22 के तहत शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण व पीड़ा के लिए 15 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी। साथ ही, धारा 18 के तहत सुरक्षा आदेश जारी करने की भी मांग की थी, ताकि पति को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क करने से रोका जा सके।
इस प्रकार, ट्रायल कोर्ट ने पत्नी को अलग से गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) देने से इनकार कर दिया था, जिसे उसने चुनौती दी। पति ने भी मजिस्ट्रेट कोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी थी।
अदालत ने कहा कि गुजारा-भत्ता दिया जाना चाहिए या नहीं, इस पर विचार करते समय अदालत को कई बातों को ध्यान में रखना होता है: पति की कमाने की क्षमता, पत्नी और उसके बच्चे की गुजारा-भत्ते की जरूरत, उनकी जीवनशैली और उनकी बुनियादी आवश्यकताएं।
अदालत ने कहा कि पत्नी को अपने नाबालिग बच्चे की देखभाल करनी होती है। ऐसे में अगर वह अपनी योग्यता के आधार पर कोई नौकरी भी करती है तो उसे अपने काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाना होगा।
कोर्ट ने कहा,
"उसे अपने नाबालिग बच्चे की जरूरतों का ध्यान रखना पड़ता है। भले ही यह मान लिया जाए कि बच्चा जब स्कूल जाता है तब वह खाली रहती होगी, लेकिन स्कूल से बच्चे के घर लौटने के तुरंत बाद, उसे बच्चे के बालिग होने तक उसकी देखभाल करनी पड़ती है। प्रतिवादी ने अपनी संपत्ति और देनदारियों के विवरण (Assets and Liabilities Statement) में खुद बताया है कि उसकी सैलरी 3,37,845 रुपये प्रति माह है।
यह बात मानी गई है कि प्रतिवादी (पति) अमेरिका में काम करता है और डॉलर में कमाई करता है। प्रतिवादी ने अपनी सही आय दिखाने के लिए अपना सैलरी सर्टिफिकेट पेश नहीं किया, जिसका मतलब है कि उसने अपनी वास्तविक आय को छिपाया है। यह भी एक स्वीकृत तथ्य है कि प्रतिवादी के पिता एक सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) कर्मचारी हैं। उन्हें 58,000 रुपये प्रति माह पेंशन मिलती है। प्रतिवादी ने खुद जिरह (Cross-Examination) के दौरान बताया कि उसके पिता को 58,000 रुपये पेंशन मिलती है। लेकिन, अदालत को गुमराह करने के लिए प्रतिवादी ने अपनी संपत्ति और देनदारियों के विवरण में बताया कि आश्रितों (Dependents) पर होने वाला खर्च 3,96,250 रुपये है। प्रतिवादी के पिता के पास मैसूर और बेंगलुरु में संपत्तियां हैं। प्रतिवादी के पिता अपने खुद के घर में रहते हैं। ऐसी परिस्थितियों में यह नहीं माना जा सकता कि प्रतिवादी पर अपने किसी आश्रित की देखभाल करने का कोई बोझ है।"
इसमें कहा गया कि तलाक के बाद भी पति अपनी पत्नी और बच्चे को गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) देने के लिए जिम्मेदार है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी पति की आय के 40% तक के हिस्से की मांग नहीं कर सकती; आमतौर पर कोर्ट पति की आय के 20% तक का गुजारा-भत्ता देने का आदेश दे सकता है।
कोर्ट ने आगे कहा कि सिर्फ इसलिए कि पत्नी के पास B.E. (इलेक्ट्रॉनिक्स) की डिग्री है और उसने अमेरिका से SAP (सिस्टम्स, एप्लीकेशन्स एंड प्रोडक्ट्स) का कोर्स भी किया, पति को गुजारा-भत्ता देने की जिम्मेदारी से छूट नहीं मिल सकती।
कोर्ट ने कहा कि जिस मां के पास बच्चे की कस्टडी होती है, वह न केवल बच्चे के पालन-पोषण पर पैसे खर्च करती है, बल्कि अपना काफी समय और मेहनत भी लगाती है—जिसे पैसों में नहीं मापा जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"चूंकि याचिकाकर्ता (पत्नी) को बच्चे की देखभाल करनी होती है, इसलिए अगर वह नौकरी करना भी चाहे तो उसे साथ ही बच्चे का भी ध्यान रखना होगा, जिससे उसके नौकरी के अवसरों पर बुरा असर पड़ सकता है। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, यह कोर्ट मानती है कि याचिकाकर्ता जीवन भर या दोबारा शादी करने तक हर महीने 20,000 रुपये का गुजारा-भत्ता पाने की हकदार है। अगर किसी अन्य फोरम (अदालत या संस्था) से भी याचिकाकर्ता को गुजारा-भत्ता मिलता है, तो इस राशि को उसमें एडजस्ट किया जा सकता है। ट्रायल कोर्ट का वह फैसला, जिसमें याचिकाकर्ता को गुजारा-भत्ता देने से इनकार कर दिया गया था, सही नहीं है। इसलिए यह कोर्ट मानती है कि याचिकाकर्ता अपने पति से हर महीने 20,000 रुपये का गुजारा-भत्ता पाने की हकदार है।"
इस तरह कोर्ट ने पत्नी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया और कहा कि वह याचिका दायर करने की तारीख से ही हर महीने 20,000 रुपये का गुजारा-भत्ता पाने की हकदार है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें बच्चे के लिए 15,000 रुपये प्रति माह का गुजारा-भत्ता, बच्चे की पढ़ाई के खर्च के लिए 1,60,000 रुपये सालाना, और मुआवजे के तौर पर 8,00,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने पति की अपील खारिज की।
Case Title : X v/s Y

