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पत्नियों के साथ असमान व्यवहार करना, मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक का एक वैध आधारः केरल हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
19 Dec 2021 1:42 PM GMT
पत्नियों के साथ असमान व्यवहार करना, मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक का एक वैध आधारः केरल हाईकोर्ट
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केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि दूसरी शादी के बाद एक मुस्लिम व्यक्ति का अपनी पहली पत्नी के साथ वैवाहिक दायित्वों को निभाने से इनकार करना तलाक के लिए एक उचित आधार है।

जस्टिस ए. मोहम्मद मुस्तक और जस्टिस सोफी थॉमस की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा किः

''पहली पत्नी के साथ सहवास करने और वैवाहिक दायित्वों को निभाने से इनकार करना कुरान के आदेशों के उल्लंघन के समान है, जो पति द्वारा एक से अधिक विवाह करने पर पत्नियों के समान व्यवहार करने का आदेश देता है। ऐसी परिस्थितियों में, हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि अपीलकर्ता-पत्नी इस आधार पर भी तलाक की डिक्री प्राप्त करने की हकदार है।''

कोर्ट ने आगे कहा,

''यदि पहली शादी के निर्वाह के दौरान किसी अन्य महिला के साथ विवाह किया जाता है, तो पति पर यह साबित करने का भार होता है कि उसने कुरान के आदेश के अनुसार दोनों पत्नियों के साथ समान व्यवहार किया है।''

बेंच ने एक मुस्लिम महिला की तरफ से दायर एक अपील पर अपना फैसला सुनाया है,जिसने एक फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने इस महिला को तलाक की डिक्री देने से इनकार कर दिया था।

उसने प्रतिवादी से वर्ष 1991 में विवाह किया था और इस विवाह के बाद उन दोनों के तीन बच्चे हुए। विदेश में रहने के दौरान, प्रतिवादी ने अपनी पहली शादी के निर्वाह के दौरान एक अन्य महिला के साथ विवाह कर लिया।

तलाक के लिए उसने अपनी याचिका में मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 की धारा 2(ii), 2(iv) और 2(viii) के तहत दिए गए आधारों का उल्लेख किया। दलीलों के दौरान, धारा 2(viii)(एफ) का भी उल्लेख किया गया।

कोर्ट ने कहा कि धारा 2 (ii) के अनुसार, पत्नी तलाक की हकदार है यदि पति ने दो साल की अवधि के लिए उसके भरण-पोषण की उपेक्षा की है या उसे प्रदान करने में विफल रहा है।

हालांकि, रिकॉर्ड के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि पति ने विदेश में रहने के दौरान अपीलकर्ता के लिए भरण-पोषण प्रदान किया था और हाईकोर्ट इस आधार पर ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष से सहमत है।

अगले आधार पर आते हुए कोर्ट ने धारा 2(iv) पर विचार किया,जिसमें कहा गया है कि अगर पति बिना किसी उचित कारण के, तीन साल की अवधि के लिए अपने वैवाहिक दायित्वों को निभाने में विफल रहता है, तो वह तलाक की हकदार है।

अपीलकर्ता ने याचिका में कहा है कि 21.02.2014 से प्रतिवादी-पति ने उससे मिलना बंद कर दिया था और लिखित बयान में भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया गया है। दूसरी ओर, प्रतिवादी के अनुसार, उसे दूसरी महिला से शादी करने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि अपीलकर्ता उसकी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने में उसके साथ सहयोग करने में विफल रही है।

कोर्ट ने कहा कि,

''हम इस संबंध में प्रतिवादी के कथन पर विश्वास करने के लिए राजी नहीं हैं। इस विवाह से तीन बच्चे पैदा हुए हैं। उनमें से दो ने शादी कर ली है। यह दिखाने के लिए बिल्कुल कोई सबूत नहीं है कि प्रतिवादी अपीलकर्ता के साथ रहने के लिए तैयार था। इसका मतलब है कि वह वैवाहिक दायित्वों को निभाने में विफल रहा है। तलाक के लिए याचिका वर्ष 2019 में दायर की गई थी। वे इस याचिका को दायर करने से पहले ही कम से कम पांच साल की अवधि से अलग रह रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में, हमारा विचार है कि अपीलकर्ता ने अधिनियम की धारा 2(iv) के तहत तलाक के लिए आधार बनाया है।''

हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने इस धारणा पर अमल किया है कि भरण-पोषण प्रदान करना यह साबित करने के लिए पर्याप्त होगा कि पति ने वैवाहिक दायित्वों का पालन किया है। बेंच ने इस निष्कर्ष को गलत माना और कानून की जांच में उचित नहीं पाया।

अंत में, धारा 2(viii) (ए) और (एफ) इस प्रकार हैः

''यदि पति उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करता है, अर्थात- (ए) आदतन उसके साथ मारपीट करता है या अपने आचरण की क्रूरता से उसके जीवन को दयनीय बना देता है, भले ही ऐसा आचरण शारीरिक दुर्व्यवहार के समान न हो, या (एफ) यदि उसके पास एक से अधिक पत्नियां है और कुरान के आदेशों के अनुसार उसके साथ समान व्यवहार नहीं करता है।''

चूंकि पिछले 5 वर्षों में कोई सहवास हुआ है, इसलिए न्यायालय ने पाया कि अधिनियम के संदर्भ में शारीरिक या मानसिक क्रूरता के मामले को उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

हालांकि, प्रतिवादी ने दूसरी शादी करने के संबंध में किए गए दावों से इनकार नहीं किया है। पहली पत्नी से पांच साल तक दूर रहना स्वयं ही यह दर्शाता है कि प्रतिवादी ने उनके साथ समान व्यवहार नहीं किया। प्रतिवादी के पास ऐसा कोई मामला नहीं है कि वह वर्ष 2014 के बाद अपीलकर्ता के साथ रहा है।

यह देखते हुए कि पहली पत्नी के साथ सहवास करने और वैवाहिक दायित्वों को निभाने से इनकार करना कुरान के आदेशों के उल्लंघन के समान है, अदालत ने इसे तलाक देने के लिए एक उपयुक्त मामला पाया।

इस प्रकार अपील को अनुमति दी गई और निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया गया।

अपीलकर्ता का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता सी. इजलाल और उम्मुल फिदा ने किया जबकि प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता टी.पी. साजिद और शिफा लतीफ ने किया।

केस का शीर्षक- रामला बनाम अब्दुल राहुफ़

आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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