लॉरेंस बिश्नोई गैंग के कथित सदस्य को डबल मर्डर केस में 4 साल जेल में रहने के बाद हाईकोर्ट से मिली ज़मानत
Shahadat
10 Aug 2026 6:47 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने लॉरेंस बिश्नोई गैंग के कथित सदस्य को डबल मर्डर केस में रेगुलर ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि उस पर जो आरोप हैं - जैसे हथियार का इंतज़ाम करना और हमलावरों को पनाह देना - वे IPC की धारा 302 के तहत अपराध को सीधे अंजाम देने से अलग और दूर की बात हैं। [2026 LL (PH) 263]
कोर्ट ने कहा कि उसके खिलाफ़ मामला एक सह-आरोपी के बयान पर आधारित है।
जस्टिस मनीषा बत्रा ने देखा कि याचिकाकर्ता पहले ही लगभग चार साल और चार महीने जेल में बिता चुका है, जबकि अभियोजन पक्ष के 91 गवाहों में से केवल 38 से ही पूछताछ हुई। ऐसे में ट्रायल शुरू होने से पहले और ज़्यादा समय तक जेल में रखना न्याय के हित में नहीं होगा।
"चूंकि उसके खिलाफ़ मामला सह-आरोपी के बयान पर आधारित है, इसलिए यह मामला ट्रायल कोर्ट पर छोड़ देना बेहतर है कि वह ट्रायल के दौरान पेश किए जाने वाले सबूतों की अच्छी तरह से जांच-पड़ताल करके इस पर फैसला करे।"
अभियोजन पक्ष का मामला 2022 में दर्ज FIR से जुड़ा है। यह FIR गुरुग्राम में दो भाइयों, परमजीत सिंह और सुजीत सिंह की गोली मारकर हत्या के मामले में IPC की धारा 148 (दंगा करना, घातक हथियार से लैस होना), 149 (गैर-कानूनी जमावड़ा), 302 (हत्या), 201 (अपराध के सबूत मिटाना) और 120-B (आपराधिक साजिश) के तहत दर्ज की गई।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि याचिकाकर्ता, जो लॉरेंस बिश्नोई गैंग का कथित सदस्य है, उसने हथियार हासिल करने में मदद की, घटना के बाद हमलावरों को पनाह दी और उन्हें भागने में मदद की। जांच के दौरान एक सह-आरोपी द्वारा नाम लिए जाने के बाद याचिकाकर्ता को 15 मार्च, 2022 को गिरफ्तार किया गया।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि FIR में उसका नाम नहीं था, उस पर कोई खास काम करने का आरोप नहीं लगाया गया था, वह घटना स्थल पर मौजूद नहीं था, अन्य आरोपियों ने उसका नाम नहीं लिया और उसके पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ। यह दलील दी गई कि उस पर गोली चलाने वालों में शामिल होने का आरोप नहीं था, वह 15.03.2022 से हिरासत में था, और निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की संभावना कम थी।
राज्य ने ज़मानत का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि उसने मुख्य आरोपी के साथ साज़िश रची थी और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए उनके संपर्क में था।
जस्टिस बत्रा ने कहा कि याचिकाकर्ता और हथियार सप्लाई करने या सह-आरोपी को पनाह देने के बीच जो संबंध बताया जा रहा था, वह मुख्य रूप से एक सह-आरोपी के बयान और हालात से जुड़े अनुमानों पर आधारित था। साथ ही उसकी भूमिका एक ज़रिया या मदद करने वाले की थी, जो IPC की धारा 302 के तहत सज़ा-योग्य अपराध को सीधे अंजाम देने से काफ़ी अलग और दूर थी।
अदालत ने यह भी कहा कि हालाँकि आरोप गंभीर थे, लेकिन मुख्य बात यह तय करना था कि क्या याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ मौजूद सबूत उसे ट्रायल से पहले हिरासत में रखने को सही ठहराते हैं। उसकी सीमित भूमिका, हिरासत की अवधि और ट्रायल की रफ़्तार को देखते हुए अदालत ने माना कि उसे हिरासत में बनाए रखना न्याय के हित में नहीं होगा।
Title: Karambir @ Karmu v. State of Haryana
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