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बिहार और उड़ीसा पब्लिक डिमांड रिकवरी एक्ट और एनआई एक्ट के तहत अंतरिम मुआवजे के आदेश को 'सार्वजनिक मांग' के रूप में लागू किया जा सकता है: पटना हाईकोर्ट

Shahadat
12 May 2022 6:57 AM GMT
बिहार और उड़ीसा पब्लिक डिमांड रिकवरी एक्ट और एनआई एक्ट के तहत अंतरिम मुआवजे के आदेश को सार्वजनिक मांग के रूप में लागू किया जा सकता है: पटना हाईकोर्ट
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पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (एनआई एक्ट) के तहत अंतरिम मुआवजे के भुगतान का आदेश बिहार और उड़ीसा पब्लिक डिमांड रिकवरी एक्ट, 1914 (रिकवरी एक्ट) तहत 'पब्लिक डिमांड' के रूप में लागू किया जा सकता है।

चीफ जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एस कुमार की खंडपीठ ने कहा,

"एनआई अधिनियम की धारा 143ए के तहत आदेशित अंतरिम मुआवजा सीआरपीसी की धारा 421 के तहत जुर्माना के रूप में वसूली योग्य है, जो कि स्पष्ट रूप से 'सार्वजनिक मांग' की परिभाषा के अंतर्गत आता है। याचिकाकर्ता की दलील के अनुसार, वसूली अधिनियम की गैर-प्रयोज्यता को अनिवार्य रूप से नकारा जाना चाहिए।"

तथ्यात्मक पृष्ठभूमि:

प्रतिवादी नंबर चार अरुण कुमार ("निजी प्रतिवादी") धान, गेहूं आदि के व्यापारी ने कथित तौर पर याचिकाकर्ता सुनील कुमार को 23.08.2018 और 30.08.2018 के बीच की अवधि में 1,26,75,600 / - रुपये का माल दिया। याचिकाकर्ता ने कीमत के रूप में 15.03.2019 को चेक जारी किया। हालांकि, चेक को प्रस्तुत करने पर बैंक द्वारा डिसऑनर (अनादर) कर दिया गया। इसलिए, निजी प्रतिवादी ने कानूनी नोटिस भेजा। लेकिन याचिकाकर्ता अनुपालन करने में विफल रहा। इसके बाद निजी प्रतिवादी ने 16.04.2019 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, औरंगाबाद के समक्ष एनआई अधिनियम की धारा 138 के तहत शिकायत का मामला दायर किया।

अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट III, औरंगाबाद ने आदेश दिनांक 21.11.2019 के द्वारा तथ्यों और रिकॉर्ड पर विचार करते हुए 25,00,000/- रुपये के अंतरिम मुआवजे का आदेश पारित किया। एनआई अधिनियम की धारा 143ए के तहत याचिकाकर्ता द्वारा निजी प्रतिवादी को आदेश की तारीख से साठ दिनों की अवधि के भीतर भुगतान किया जाना है।

इसके बाद 28.01.2021 को निष्पादन का आदेश पारित किया गया। उसमें यह नोट किया गया कि मूल आदेश के बाद से पर्याप्त समय बीत चुका है। इसलिए, इसका विस्तार प्रदान नहीं किया जा सकत। वहीं दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 421 (1) (बी) लागू की गई है और कलेक्टर, औरंगाबाद को वारंट जारी किया गया है, जिसमें उन्हें याचिकाकर्ता की अचल और चल से संपत्ति से उपरोक्त राशि की वसूली के लिए अधिकृत किया गया है।

उपरोक्त आदेश के तहत कलेक्टर, औरंगाबाद ने इसे उपयुक्त कार्रवाई के लिए जिला प्रमाण पत्र अधिकारी, औरंगाबाद को अग्रेषित किया। उन्होंने प्रमाण पत्र का मामला दर्ज किया और दिनांक 03.12.2021 को नोटिस जारी कर याचिकाकर्ता को उक्त राशि का भुगतान तीस दिन की अवधि के भीतर करने के लिए कहा। इसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

विचाराधीन मुद्दा:

क्या नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के तहत अंतरिम मुआवजे के भुगतान के आदेश को बिहार और उड़ीसा पब्लिक डिमांड रिकवरी एक्ट, 1914 के तहत 'पब्लिक डिमांड' के रूप में लागू किया जा सकता है?

न्यायालय की टिप्पणियां:

कोर्ट ने कहा कि एनआई अधिनियम की धारा 143ए की उप-धारा (5) में विशेष रूप से कहा गया कि धारा के तहत देय अंतरिम मुआवजा सीआरपीसी की धारा 421 के तहत जुर्माने के रूप में वसूली योग्य है। इसके अतिरिक्त धारा 421(1)(बी) उक्त चूककर्ता की चल एवं अचल संपत्तियों से भू-राजस्व की बकाया राशि की वसूली के लिए कलेक्टर को वारंट जारी करने का प्रावधान करती है। पुनः, वसूली अधिनियम की अनुसूची I के खंड 3 में कहा गया कि उक्त उद्देश्य के लिए अधिकृत प्रक्रिया द्वारा भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूली योग्य किसी भी धन को अधिनियम की धारा तीन के तहत 'सार्वजनिक मांग' माना जाएगा।

इसलिए, न्यायालय ने माना कि एनआई अधिनियम की धारा 143ए के तहत आदेशित अंतरिम मुआवजा सीआरपीसी की धारा 421 के तहत जुर्माना के रूप में वसूली योग्य है, जो स्पष्ट रूप से 'सार्वजनिक मांग' की परिभाषा के अंतर्गत आता है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के रिकवरी एक्ट के लागू न होने के तर्क को खारिज कर दिया और कहा,

"एक बार उपरोक्त प्रश्न का सकारात्मक उत्तर देने के बाद यह कहना है कि एनआई अधिनियम के तहत आदेशित अंतरिम मुआवजा वसूली अधिनियम की अनुसूची I के दायरे में आता है, उसके तहत वसूली को रोका नहीं जा सकता है। निचली अदालत का भू-राजस्व के रूप में अंतरिम मुआवजे की वसूली के लिए एनआई अधिनियम की धारा 143ए के तहत आदेश जारी करना सही है।"

तद्नुसार याचिका का निस्तारण किया गया।

केस टाइटल: सुनील कुमार बनाम बिहार राज्य और अन्य।

मामला नंबर: 2022 का सिविल रिट क्षेत्राधिकार मामला नंबर 73

निर्णय दिनांक: 10 मई 2022

कोरम: चीफ जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एस कुमार

जजमेंट लेखक: चीफ जस्टिस संजय करोली

याचिकाकर्ता के वकील: सुमीत कुमार सिंह, अमरेन्द्र कुमार सिंह, निखिल सिंह, शताक्षी सहाय।

प्रतिवादियों के लिए वकील: अनिल कुमार सिंह (जीपी 26) और एडवोकेट संजय कुमार।

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