नोएडा DM मेधा रूपम की NSA याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, रोस्टर से अलग बेंच के समक्ष लिस्टिंग पर सवाल
Praveen Mishra
23 Sept 2026 9:11 PM IST

नोएडा (गौतमबुद्ध नगर) के मजदूर प्रदर्शन से जुड़े एक छात्र की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को रद्द करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुप्रीम कोर्ट में हुई लिस्टिंग ने मामलों के रोस्टर और कनेक्टेड मामलों की सुनवाई को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दायर याचिकाओं पर बुधवार को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई की। रिपोर्ट के अनुसार, 13 जुलाई 2026 से प्रभावी सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर में Habeas Corpus और Preventive Detention से जुड़े मामले इस पीठ के रोस्टर में शामिल नहीं हैं।
हाईकोर्ट के आदेश पर रोक
जस्टिस शर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें छात्र की NSA के तहत हिरासत को रद्द किया गया था।
हाईकोर्ट ने छात्र को ₹5 लाख मुआवजा देने का भी निर्देश दिया था। यह राशि जिलाधिकारी के व्यक्तिगत वेतन से वसूल किए जाने का निर्देश था। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद इस निर्देश पर भी फिलहाल रोक है।
मामला Medha Roopam v. Akriti Chaudhary & Ors., Diary No. 56202/2026 के रूप में दर्ज है।
Preventive Detention मामलों का रोस्टर क्या कहता है?
13 जुलाई 2026 के सुप्रीम कोर्ट रोस्टर के अनुसार, Habeas Corpus और Preventive Detention (Category 2201-2202) से जुड़े मामले वरिष्ठता क्रम में शुरुआती चार पीठों को सौंपे गए हैं।
इनमें चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एमएम सुंदरेश की अध्यक्षता वाली पीठें शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई पहले से जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है।
इसी प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामले भी लंबित
नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े कई मामले सुप्रीम कोर्ट में पहले से लंबित हैं।
केशव आनंद की याचिका में उनके भाई आदित्य आनंद और ऑटो चालक रूपेश रॉय को कोर्ट के समक्ष पेश करने की मांग की गई थी। दोनों की गिरफ्तारी को भी चुनौती दी गई थी। 8 मई को नोटिस जारी होने के बाद 15 मई को सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों को उत्तर प्रदेश पुलिस के माध्यम से कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश दिया था। इसके बाद उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाई गई और याचिका लंबित रही।
इसी तरह पत्रकार सत्यम वर्मा की पत्नी ने अपने पति की NSA के तहत preventive detention को चुनौती दी थी। यह याचिका बाद में 7 सितंबर को हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता के साथ वापस ले ली गई।
इसके अलावा कानून के छात्र योगेश मीणा ने भी नोएडा मजदूर प्रदर्शन के संबंध में अपनी गिरफ्तारी और कथित पुलिस उत्पीड़न को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। यह मामला भी जस्टिस नागरत्ना की पीठ के समक्ष आया था और अभी लंबित है।
सवाल- कनेक्टेड मामलों की सुनवाई अलग पीठ के सामने क्यों?
रिपोर्ट में मुख्य सवाल यह उठाया गया है कि जब नोएडा प्रदर्शन से जुड़े अन्य Habeas Corpus और Preventive Detention मामले जस्टिस नागरत्ना की पीठ के समक्ष लंबित हैं, तो जिलाधिकारी और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाएं जस्टिस शर्मा की पीठ के सामने कैसे सूचीबद्ध हुईं।
इन याचिकाओं को भी Category 2202 के तहत रखा गया है, जबकि यह कैटेगरी जस्टिस शर्मा के नियमित रोस्टर में दिखाई नहीं देती।
आमतौर पर एक ही मामले से जुड़े कनेक्टेड मामलों को उसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने की प्रथा रही है। हालांकि, जस्टिस शर्मा के रोस्टर में “any other matters specially assigned” का प्रावधान मौजूद है। इसलिए रिपोर्ट में यह संभावना व्यक्त की गई है कि मामला विशेष रूप से इस पीठ को सौंपा गया हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में Master of Roster की प्रशासनिक शक्ति चीफ़ जस्टिस के पास होती है।
सुनवाई के दौरान मीडिया एक्सेस का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान एक अन्य घटनाक्रम भी सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग कार्यवाही का ऑडियो म्यूट करने का निर्देश दिया, जिससे कोर्ट रिपोर्टर्स को सुनवाई की कार्यवाही सुनने में असुविधा हुई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कोर्ट रिपोर्टर्स को भौतिक रूप से कोर्टरूम में मौजूद रहने की अनुमति नहीं थी और VC ऑडियो म्यूट होने के कारण वे कार्यवाही को सुन नहीं सके।
इस घटनाक्रम को लेकर भी ओपन कोर्ट की कार्यवाही और मीडिया की पहुंच से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।
पारदर्शिता को लेकर उठे सवाल
पूरे घटनाक्रम के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि मामले की असामान्य लिस्टिंग, कनेक्टेड मामलों की अलग-अलग पीठों के समक्ष सुनवाई और VC ऑडियो म्यूट किए जाने के कारण न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास से जुड़े प्रश्न उठते हैं।
हालांकि, उपलब्ध सामग्री में इस विशेष लिस्टिंग के कारण के संबंध में सुप्रीम कोर्ट प्रशासन या मुख्य न्यायाधीश की ओर से कोई स्पष्टीकरण दर्ज नहीं है। इसलिए विशेष असाइनमेंट के संबंध में अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय इसे एक संभावित प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

