2.10 करोड़ से ज्यादा मामलों का निपटारा, ₹13,589 करोड़ के समझौतों के साथ तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत संपन्न

Praveen Mishra

12 Sept 2026 8:30 PM IST

  • 2.10 करोड़ से ज्यादा मामलों का निपटारा, ₹13,589 करोड़ के समझौतों के साथ तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत संपन्न

    राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा वर्ष 2026 की तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन 12 सितंबर को देशभर में किया गया। इसका उद्देश्य लंबित और प्री-लिटिगेशन मामलों को आपसी सहमति और समझौते के माध्यम से सरल एवं त्वरित तरीके से निपटाना रहा।

    इस राष्ट्रीय लोक अदालत में 26 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में विभिन्न स्तरों पर लोक अदालत पीठों का गठन किया गया। इसमें उच्च न्यायालयों से लेकर तालुका स्तर तक न्यायिक अधिकारियों, अधिवक्ताओं, पैरा-लीगल वॉलंटियर्स और पक्षकारों ने भाग लिया।

    NALSA के अनुसार, 12 सितंबर 2026 को शाम 7 बजे तक प्राप्त अस्थायी आंकड़ों के मुताबिक, कर्नाटक, राजस्थान और दिल्ली को छोड़कर—जहां लोक अदालत क्रमशः 19 सितंबर, 10 अक्टूबर और 25 अक्टूबर को आयोजित की जानी है—2,10,39,112 मामलों का निपटारा किया गया।

    इनमें 1,90,75,743 प्री-लिटिगेशन मामले और 19,63,369 पहले से अदालतों में लंबित मामले शामिल हैं। इन मामलों में हुए समझौतों में कुल ₹13,589.28 करोड़ की राशि शामिल रही।

    लोक अदालत में चेक बाउंस, मोटर दुर्घटना मुआवजा दावे, वैवाहिक विवाद, श्रम विवाद, उपभोक्ता शिकायतें, भूमि अधिग्रहण, उत्तराधिकार विवाद, छोटे व्यवसायों से जुड़े मध्यस्थता दावे, समझौता योग्य आपराधिक मामले और ट्रैफिक चालान जैसे मामलों का निपटारा किया गया। इसके अलावा बैंक ऋण वसूली, सेवा संबंधी मामले, राजस्व विवाद और सार्वजनिक उपयोगिता से जुड़ी शिकायतें भी शामिल रहीं।

    भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं NALSA के संरक्षक-प्रमुख, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने लोक अदालत से पहले अपने संदेश में कहा कि न्याय तक पहुंच केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि ऐसी वास्तविकता होनी चाहिए जो हर दरवाजे तक पहुंचे। उन्होंने नागरिकों से विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए लोक अदालतों को त्वरित और सरल माध्यम के रूप में अपनाने की अपील की।

    वहीं, NALSA के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि लोक अदालतें लंबे समय से लंबित मामलों को कम करने के साथ-साथ पक्षकारों को लंबी मुकदमेबाजी के खर्च और देरी से बचाते हुए पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान तक पहुंचने में मदद करती हैं।

    लोक अदालत में पारित अवार्ड को डिक्री के समान अंतिम और बाध्यकारी माना जाता है तथा इसमें सामान्यतः अपील का प्रावधान नहीं होता। साथ ही, भुगतान किए गए न्यायालय शुल्क की वापसी भी शामिल है, जिससे पक्षकारों पर समझौते का अतिरिक्त खर्च नहीं पड़ता।

    NALSA के अनुसार, तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि न्याय केवल अदालत के फैसले से नहीं, बल्कि पक्षकारों की सहमति से हुए सम्मानजनक और शांतिपूर्ण समाधान के जरिए भी हासिल किया जा सकता है।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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