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मुस्लिम महिलाओं को विवाह को समाप्त करने के अतिरिक्त न्यायिक तरीकों का सहारा लेने का अधिकार, केरल हाईकोर्ट ने 49 साल पुराने फैसले को रद्द किया

LiveLaw News Network
13 April 2021 6:08 AM GMT
मुस्लिम महिलाओं को विवाह को समाप्त करने के अतिरिक्त न्यायिक तरीकों का सहारा लेने का अधिकार, केरल हाईकोर्ट ने 49 साल पुराने फैसले को रद्द किया
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49 साल पुराने एक फैसले, जिसके तहत मुस्लिम महिलाओं को विवाह को समाप्त करने के अतिरिक्त न्यायिक तरीकों का सहारा लेने से रोक दिया गया था, केरल हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया और इन तरीकों की वैधता को बरकरार रखा।

यह पाते हुए कि शासी कानून, द डिसॉल्विंग ऑफ मुस्लिम मैरिजेज एक्ट, पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं को उपलब्ध अतिरिक्त न्यायिक तलाक के तरीकों को अनकिया करने पर विचार नहीं किया, जस्टिस ए मुहम्मद मुस्ताक़ और सीएस डायस की पीठ ने कहा, "शरीयत एक्‍ट की धारा 2 में उल्लिखित अतिरिक्त न्यायिक तलाक के अन्य सभी प्रकार इस प्रकार मुस्लिम महिलाओं के लिए उपलब्ध हैं। इसलिए, हम मानते हैं कि केसी मोइन के मामले (सुप्रा) में घोषित कानून अच्छा कानून नहीं है।"

कोर्ट ने यह फैसला ऐसी महिलाओं की ओर से दायर याचिकाओं के एक बैच पर दिया, जिन्होंने विवाह की समाप्त‌ि के लिए अतिरिक्त न्यायिक तरीकों का सहारा लिया था।

"ऊपर बताए गए मुद्दे को परम न्याय से जोड़ा गया है, जिसकी इन सभी मामलों में शामिल महिलाओं की तलाश है। ये मामले समाज की पितृसत्तात्मक सोच के बारे में प्रचुरता में बोलते हैं, जिसके तहत दशकों से मुस्लिम महिलाओं को अतिरिक्त न्यायिक तलाक को आमंत्रित करने के उनके अधिकार से वंचित किया गया है।

जबकि 'ट्रिपल तलाक' जैसी गैर-इस्लामिक प्रथा' को बरकरार रखने के लिए बड़ा कोलाहल था, मुस्लिम महिलाओं के अतिरिक्त न्यायिक तलाक को लागू करने के अधिकार को बहाल करने के लिए ऐसी कोई खुली और स्पष्ट मांग नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत वादों की गारंटी के बावजूद महिलाओं की ऐसी दुर्दशा है।"

77-पृष्ठ के फैसले की शुरुआत में, कोर्ट ने सवाल किया कि क्या विधायिका का इरादा अतिरिक्त न्यायिक तलाक को समाप्त करना था, जिसका अन्यथा विभिन्न स्कूलों के अनुयायियों द्वारा उपयोग किया जाता है।

कोर्ट ने सवाल को कैसे हल किया है

फैसले में, कोर्ट ने विवाह को समाप्त करने के विभिन्न तरीकों पर विस्तृत चर्चा की। फैसले से पहले, बेंच ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में विवाह समाप्त‌ि के आम तौर-तरीकों की चर्चा है और फिर विशेष रूप से महिलाओं के लिए उपलब्ध साधनों पर चर्चा की ।

महिलाओं के लिए उपलब्ध तरीको पर कोर्ट ने कहा,

- तलाक़-ए-तफ़ाविज़, जहां पत्नी विवाह को समाप्त कर सकती है, यदि उसका पति विवाह के समझौते की शर्तों को पूरा करने में विफल रहता है,

- खुला, जहां पत्नी मेहर को लौटाकर एकतरफा तरीके से पति को तलाक दे सकती है,

- मुबारात, आपसी सहमति से तलाक

- फस्ख, तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप से ‌विवाह की समाप्‍ति जैसे क़ाज़ी।

कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम विवाह और अन्य प्रथाओं को नियंत्रित करने के लिए बना पिछला कानून, शरीयत एक्ट, 1937 ने विशेष रूप से फस्ख को छोड़कर सभी अतिरिक्त न्यायिक तलाक के तरीकों को मान्यता दी।

कोर्ट ने बताया कि शरीयत एक्ट की धारा 2 ने विशेष रूप से फस्ख को छोड़कर अतिरिक्त न्यायिक तलाक के सभी तरीकों को मान्यता दी।

केसी मोयिन बनाम नफीसा में, हाईकोर्ट ने घोषणा की थी कि एक महिला केवल मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम उपयोग कर सकती है और व्यक्तिगत कानून (अतिरिक्त-न्यायिक उपचार) का उपयोग नहीं कर सकती।

मुस्लिम विवाह अधिनियम के विघटन के प्रावधानों का विश्लेषण करने के बाद इस बात से असहमत होकर कोर्ट ने फैसला दिया, "शरीयत एक्ट की स्कीम के साथ डिजॉल्यूशन मुस्लिम मैरिजेज़ एक्ट के समग्र विश्लेषण पर, हम मानते हैं कि डिजॉल्यूशन मुस्लिम मैरिजेज़ एक्ट मुस्लिम महिलाओं को कोर्ट के हस्तक्षेप को छोड़कर, फस्ख का उपयोग कर विवाह को समाप्त करने से रोकती है। सभी प्रकार के अतिरिक्त न्यायिक तलाक, जिनका शरीयत अधिनियम की धारा 2 में जिक्र है, इस प्रकार मुस्लिम महिलाओं के लिए उपलब्ध हैं। इसलिए, हम मानते हैं कि केसी मोइन के मामले (सुप्रा) में घोषित कानून अच्छा कानून नहीं है।"

खुला पर

कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिला को खुला का उपयोग करने का बिना शर्त का अधिकार लेकिन बिना सुलह के प्रयास के, इसका उपयोग कानून में खराब होगा।

"अगर खुला का का इस्तेमाल करने की बेलगाम शक्ति, एक मुस्लिम महिला को दी जाती है, तो इससे दोनों को अनकहा दुख और तकलीफ हो सकती है ..."

फैमिली कोर्ट कैसे विवाह समाप्‍ति के अतिरिक्त-न्यायिक तरीकों पर फैसला देते हैं

खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट को किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति की घोषणा के लिए अतिरिक्त न्यायिक तलाक का समर्थन करने में कोई कठिनाई नहीं है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों या दोनों पक्षों द्वारा इस प्रकार के आवेदनों को दोनों पक्षों की वैवाहिक स्थिति की घोषणा करने के लिए तल्ख, खुला, मुबारात, तालक़-ए-तफ़ावीज़ के मामले में सुनवाई करेगा।

एकपक्षीय तरीकों जैसे खुला और तालाक पर कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के समक्ष ऐसे मामलों में जांच का दायरा सीमित होगा। इस प्रकार की कार्यवाही में, हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि अदालत अन्य पक्षों को उचित नोटिस के बाद पक्षों की वैवाहिक स्थिति की घोषणा करने के लिए खुला या तालाक को रिकॉर्ड करती है।

विवाह समाप्‍ति के आपसी सहमति के तरीके, जैसे कि मुबारात और तलाक़-ए-तफ़ाविज़ पर कोर्ट ने कहा कि इस बात पर संतुष्ट होने पर कि विवाह समाप्‍ति आपसी सहमति से किया जा रहा है, आगे की जांच के बिना फैमिली कोर्ट वैवाहिक स्थिति की घोषणा करेगा।

बेंच ने फैमिली कोर्ट को विशेष रूप से अतिरिक्त न्यायिक तलाक पर फैसला न करने का निर्देश दिया, जब तक कि न्यायालयों की उचित तरीकों के साथ ऐसा करने को ना कहा जाए।

कोर्ट ने खुला की प्रथा और पुरुषों के लिए उपलब्ध विवाह समाप्‍ति की अधिक व्यापक प्रथा, तलाक के बीच समानताओं का जिक्र किया, क्योंकि ये दोनों प्रथाएं एकतरफा तलाक का तरीका हैं।

केस टाइटिल: xxxxxxxxxx V. xxxxxxxxxx और जुड़ी हुई याचिकाएं

प्रतिनिधित्व: य‌ाचिकाकर्ता की ओर से एमिकस क्यूरीए एडवोकेट्स माथर केआई और वाहीदा बाबू, एडवोकेट्स बाबू करुकापदथ, आर.रंजीथ मंजेरी, नारायणन पी, वीके हिमा और अथिरा ए मेनन याचिकाकर्ताओं के लिए।

केरल फेडरेशन ऑफ वुमेन लॉयर्स, जिन्होंने अदालत में पक्ष रखना की अनुमति मांगी थी, का प्रतिनिधित्व एडवोकेट शाजना एम ने किया था।

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