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नाबालिग का मासिक भरण पोषण इस निर्देश के साथ बैंक अकाउंट में जमा नहीं करवाया जा सकता कि बालिग होने पर उसे दे दिया जाएगा : केरल हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
25 Feb 2021 4:00 AM GMT
नाबालिग का मासिक भरण पोषण इस निर्देश के साथ बैंक अकाउंट में जमा नहीं करवाया जा सकता कि बालिग होने पर उसे दे दिया जाएगा : केरल हाईकोर्ट
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केरल हाईकोर्ट ने एक फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है,जिसके तहत एक पिता को निर्देश दिया गया था कि वह अपनी नाबालिग बच्ची का निर्वाह भत्ता उसके नाम से खोले गए बैंक खाते में जमा करवाए और यह राशि बच्ची के बालिग होने के बाद ही उसे प्राप्त होगी।

जस्टिस मैरी जोसेफ की सिंगल बेंच इस मामले में फैमिली कोर्ट के निर्देशों के खिलाफ नाबालिग की मां की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। फैमिली कोर्ट के निर्देश के अनुसार नाबालिग बच्ची के भरण पोषण/निर्वाह भत्ते की राशि उसकी मां को देने की बजाय एसबी खाते में जमा करवाई जानी थी। साथ ही यह राशि बैंक अधिकारियों द्वारा बच्ची के बालिग होने के बाद ही उसे दी जानी थी। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि नाबालिग लड़की को दिए जाने वाले भरण पोषण की राशि प्रतिमाह उसकी मां को दी जाए और साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि इस राशि का उपयोग केवल नाबालिग के लाभ व कल्याण के लिए किया जाए।

न्यायालय ने कहा कि,

''यह आदेश उस सीमा तक अवैधता,अशुद्धता और दुर्बलता से ग्रस्त है,जिसके तहत पति को निर्देश दिया गया है कि वह एक राष्ट्रीयकृत बैंक में नाबालिग के नाम पर एसबी खाता खोले और उस खाते में नाबालिग का मासिक निर्वाह भत्ता जमा करवाए। वहीं बैंक अधिकारी इस राशि को नाबालिग के बालिग होने के बाद ही उसे वितरित करें या अदालत द्वारा पारित आदेश के आधार पर नाबालिग के पक्ष में राशि जारी की जाए।''

हाईकोर्ट ने माना कि पिता को नाबालिग बच्ची के नाम पर एसबी खाते में सीधे भरण पोषण की राशि जमा कराने की अनुमति देने के मामले में ट्रायल कोर्ट अनुचित थी, जिसे वह राशि बालिग होने पर ही प्राप्त हो सकती है।

न्यायालय ने कहा कि मासिक भत्ते का मतलब,जिस व्यक्ति ने इसके लिए दावा किया है और अदालत ने उसे इसके लिए योग्य पाया है, वह केवल उसके पूरे महीने के व्यय को पूरा करने के लिए होता है। ऐसे में अगर मासिक भत्ते की राशि को बैंक खाते में जमा कराने का निर्देश दे दिया गया तो जिस पक्षकार के पक्ष में यह मासिक भत्ता दिया गया है,उसका दैनिक भरण-पोषण कहां से पूरा होगा।

यह भी कहा गया कि यदि मासिक भरण-पोषण भत्ता जमा करने का आदेश दिया जाता है, तो यह दंड प्रक्रिया संहिता में धारा 125 को शामिल करने के संसद के निर्धारित उद्देश्य को पराजित कर देगा। सीआरपीसी की धारा 125 के उद्देश्य के बारे में विस्तार से बताते हुए अदालत ने कहा कि भरण-पोषण भत्ता पक्षकार या नाबालिग के मामले में नजदीकी संबंधी को दिया जाता है। मासिक भत्ता शब्द से ही यह संकेत मिलता है कि यह दावेदार को दिया गया भत्ता है ताकि उसे भोजन, कपड़े, आश्रय और शिक्षा के लिए मासिक खर्चों को पूरा करने में सक्षम बनाया जा सके।

इसके अलावा यह भी देखा गया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का प्रावधान मासिक दर पर भरण-पोषण भत्ता तय करने से संबंधित है,जो पत्नी, बच्चों या माता-पिता को उस समय दिया जाता है,जब वह यह सबूत पेश करते हैं कि उनकी उपेक्षा की जा रही है या इसको देने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति ऐसा करने से मना कर रहा है और बतौर पति,पिता या बेटे के तौर पर वह ऐसा भुगतान करने में सक्षम है। यह प्रावधान स्वयं एक परिणामी घटना पर विचार करता है, जिसका प्रभाव यह होगा कि भरण-पोषण भत्ता पाने का हकदार कोई भी व्यक्ति, जब स्वयं को बनाए रखने के लिए सक्षम होगा तो न्यायालय द्वारा उसकी पात्रता को छीना जा सकता है।

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि पति अपने उन आरोपों को साबित नहीं कर पाया,जिसमें उसने कहा था कि उसकी पत्नी ने दोबारा शादी कर ली है और नाबालिग बालिका यतीमखाना में रह रही है और यह स्थापित करने के लिए कोई भी सबूत पेश नहीं कर पाया कि नाबालिग लड़की का खर्च यतीमखाना के अधिकारियों द्वारा पूरा किया जा रहा है।

मामले के तथ्य

वर्तमान मामले का विषय फैमिली कोर्ट द्वारा एक नाबालिग लड़की को दिया जाने वाला भरण-पोषण है। फैमिली कोर्ट कोझिकोड ने 2012 में एक आदेश पारित किया था, जिसमें एक नाबालिग लड़की फातिमा फिदा को 1500 रुपये प्रति माह की दर से भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था और यह राशि उसके पिता द्वारा दी जानी थी परंतु उसके पिता ने इस आदेश को वर्ष 2016 में चुनौती दी और कहा कि नाबालिग लड़की को उसकी माँ ने यतीमखाना में रखा है, जिसका नाम 'कुट्टीकट्टूर मुस्लिम यतीमखाना' है और उसके भोजन, पोशाक, उपचार और शिक्षा सहित व्यय उस संस्था के अधिकारियों द्वारा पूरे किए जा रहे हैं। उसने तर्क दिया था कि माँ ने पुनर्विवाह किया है और वह नाबालिग को दिए जाने वाले मासिक भत्ते का उपयोग अपनी व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए कर रही है। इस तरह सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दिए गए उद्देश्य को विफल किया जा रहा है।

हालांकि,नाबालिग की मां के अनुसार नाबालिग लड़की को 'दारुल कुर' अनिल करीम में भर्ती कराया गया था, जो एक आवासीय विद्यालय है और केवल बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए है और नाबालिग लड़की के शुल्क व अन्य खर्चों का भुगतान उसके द्वारा किया जाता है।

भरण-पोषण को चुनौती देने वाली पिता की याचिका के जवाब में, फैमिली कोर्ट ने अपने पूर्व के आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया था परंतु माँ को निर्देश दिया था कि वह नाबालिग बच्ची फातिमा फिदा के नाम पर एक राष्ट्रीयकृत बैंक में एस/बी खाता खोले और उसके बारे में बच्ची के पिता को सूचित कर दे। इसी के साथ पिता को निर्देश दिया गया था कि वह हर महीने बच्ची के मासिक भत्ते को इस खाते में जमा करवाकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकता है। फैमिली कोर्ट ने बैंक अधिकारियों को भी निर्देश दिया था कि इस खाते में जमा राशि को वह नाबालिग बच्ची के बालिग होने के बाद ही उसे दें या बालिग होने से पहले इस अदालत का आदेश मिलने पर ही यह राशि बच्ची को दी जाए। इसके बाद नाबालिग बेटी की मां ने फैमिली कोर्ट के इस आदेश से व्यथित होकर हाईकोर्ट के समक्ष एक रिविजन याचिका दायर की थी।

याचिकाकर्ता के लिए एडवोकेट बीएच मंसूर पेश हुए।

ऑर्डर डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें




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