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केवल कुछ महीनों तक साथ रहने और बच्चा होने से विवाह की धारणा नहीं बनती, पार्टियों का आचरण प्रासंगिक: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
5 May 2022 6:33 AM GMT
केवल कुछ महीनों तक साथ रहने और बच्चा होने से विवाह की धारणा नहीं बनती, पार्टियों का आचरण प्रासंगिक: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में एक घोषणात्मक मुकदमे में आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर कहा कि विवाह की धारणा आचरण, जीवन के ढंग और अन्य व्यक्तियों के झुकाव से निर्धारित होती है।

जस्टिस गौतम भादुड़ी और जस्टिस संजय एस अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा,

"कानून का अनुमान विवाह के पक्ष में और अवैध रिश्ते (concubinage)के खिलाफ है। जब एक पुरुष और एक महिला को कई वर्षों तक लगातार साथ रहे, लेकिन सबूत यह है कि अपीलकर्ता नंबर एक श्रीमती जानकी यादव केवल कुछ महीनों के लिए ही रहीं, इसलिए उक्त विवाह का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता।

यह ऐसा मामला नहीं है कि पार्टियां एक ही घर में कई सालों तक एक साथ रहती हैं और विवाह से बच्‍चे पैदा होते हैं। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है कि प्रतिवादी/पति अपनी पत्नी और बच्चों को स्नेह से पहचानता है। विवाह की धारणा आचरण, जीवन के ढंग और अन्य व्यक्तियों के झुकाव से स्‍थापित होती है। इसलिए, जब विवाह स्वयं सिद्ध नहीं होता तो वैधता और अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।"

मौजूदा मामले में कोर्ट फैमिली कोर्ट की ओर से पारित फैसले और डिक्री के खिलाफ एक अपील पर सुनवाई कर रहा था।

फैमिली कोर्ट में अपीलकर्ता/वादी ने एक घोषणात्मक वाद दायर किया था, जिसमें मांग की गई थी कि अपीलकर्ता नंबर एक जानकी यादव को कानूनी रूप से विवाहित पहली पत्नी घोषित किया जाए और अपीलकर्ता संख्या दो प्रिया को प्रतिवादी गोरखनाथ की वैध संतान घोषित किया गया। हालांकि अपील रद्द कर दी गई थी।

अपीलार्थी ने प्रतिवादी के खिलाफ घोषणा वाद दायर किया था, जिसमें बताया गया था कि जब प्रतिवादी थाने में नगर सैनिक के पद पर तैनात था, तब वह वादी-जानकी के घर आता-जाता था। उसने उससे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की थी।

प्रतिवादी ने वादी जानकी यादव के साथ शारीरिक संबंध बनाए थे, जिससे वह गर्भवती हो गई। जैसे ही वह गर्भवती हुई थी, कुछ ग्रामीणों की उपस्थिति में वादी और प्रतिवादी का हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह करा दिया गया।

यह दलील दी गई कि विवाह के बाद जब अपीलकर्ता संख्या एक प्रतिवादी के गांव गई तो उसने वहां चार बच्चों को देखा। पूछताछ करने पर पता चला कि चार बच्चे उसकी पहली पत्नी के थे और बताया गया कि पहले पत्नी की पांच साल पहले मौत हो गई थी। अपीलकर्ता नंबर एक ने हालांकि बातों पर भरोसा किया और प्रतिवादी के साथ वहीं रहना जारी रखा।

अपीलकर्ता संख्या एक ने अपने पहले बच्चे यानी अपीलकर्ता को जन्म दिया, जिसका अन्नप्राशन भी किया गया। प्रतिवादी ने बाद में अपीलकर्ता नंबर एक को फिर से उसके पैतृक घर पर छोड़ दिया। उसने वादा किया कि वह उसे वापस ले जाएगा, हालांकि ऐसा कभी नहीं हुआ।

अपील में बताया गया कि परिस्थितियां ऐसी बनीं की अपीलकर्ता भुखमरी के कगार पर पहुंच गए। इस प्रकार, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, मनेंद्रगढ़ के समक्ष भरण-पोषण के लिए आवेदन दायर किया गया।

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने 15-11-2010 को उस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण दायर किया गया। हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी, हालांकि घोषणात्मक मुकदमा दायर करने की स्वतंत्रता दी। जिसके बाद मौजूदा मुकदमा दायर किया गया और घोषणात्मक राहत का दावा किया गया।

प्रत्यर्थी ने वाद के कथनों का खंडन किया और कहा कि वादी संख्या एक-जानकी यादव का विवाह लछनधारी से हुआ था और वादी संख्या 2 उसकी बेटी है। उसने शारीरिक संबंध या विवाह की बात को भी नकार दिया। कहा गया कि प्रतिवादी पहले से ही विवाहित है और उसके चार बच्चे हैं, ऐसे में विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता। सीआरपीसी की धारा 125 के तहत आवेदन खारिज करने का संदर्भ भी बनाया गया।

फैमिली कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी, इसलिए उसने अपील की।

हाईकोर्ट के समक्ष, अपीलकर्ता ने प्रस्तुत किया कि फैमिली कोर्ट उन परिस्थितियों की सराहना करने में विफल रहा है, जिनमें विवाह हुआ। अपीलकर्ता संख्या एक-वादी के अनुसार प्रतिवादी पति वादी संख्या एक-जानकी के घर आता-जाता था और उसने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, जिससे वह गर्भवती हो गई। इसलिए आनन-फानन में विवाह संपन्न कराया गया।

आगे कहा गया कि दस्तावेजों से पता चलता है कि वादी संख्या 2 अस्पताल में पैदा हुई थी और पिता के नाम के स्थान पर प्रतिवादी का नाम दर्ज किया गया था।

प्रतिवादी ने तर्क दिया कि इस अनुमान के पक्ष में रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं है कि अपीलकर्ता संख्या एक पत्नी है और वे काफी समय से साथ रह रहे हैं।

उसने कहा कि कथित विवाह कराने वाले पंडित से पूछताछ नहीं की गई। अपीलकर्ता-पत्नी की मां भी यह स्थापित नहीं कर पाई कि शादी कैसे हुई। यह प्रस्तुत किया गया कि ऐसा कोई मामला नहीं है कि अपीलकर्ता-पत्नी प्रतिवादी-पति के साथ लंबे समय तक रही हो। इसलिए विवाह का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है और कथित शारीरिक संबंध से पैदा हुए बच्चे को वैध नहीं कहा जा सकता है। इसलिए, विद्वान फैमिली कोर्ट द्वारा दर्ज निष्कर्ष उचित है और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। याचिका खारिज कर दी गई।

केस शीर्षक: श्रीमती जानकी यादव और और अन्य बनाम श्री गोरखनाथ यादव


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