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वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग माध्यम से विवाह पंजीकरण- क्या डिजिटल सेवाओं को मौलिक अधिकार के रूप में मांगा जा सकता है? केरल उच्च न्यायालय जांच करेगा

LiveLaw News Network
9 Sep 2021 10:30 AM GMT
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग माध्यम से विवाह पंजीकरण- क्या डिजिटल सेवाओं को मौलिक अधिकार के रूप में मांगा जा सकता है? केरल उच्च न्यायालय जांच करेगा
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केरल उच्च न्यायालय जल्द ही यह जांच करेगा कि नागरिकों को सरकार से डिजिटल सेवाओं की मांग करने का मौलिक अधिकार है। यह सवाल वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाहों के पंजीकरण की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान उठा।

जस्टिस ए मुहम्‍मद मुस्ताक और जस्टिस कौसर एडप्पागाथ की खंडपीठ ने भी याचिकाकर्ता-जोड़ों को शारीरिक रूप से पेश हुए बिना ऑनलाइन विवाह करने और रजिस्टर करने की अनुमति देते हुए एक अंतरिम आदेश पारित किया।

पीठ ने कहा, "शुरुआत में हम बड़े सवाल का जवाब देने के आदेश जारी करने का इरादा रखते हैं कि क्या नागरिक मौलिक अधिकार के रूप में शादी के ऑनलाइन पंजीकरण सहित डिजिटल सेवाओं की मांग कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या नागरिकों को सरकार से डिजिटल सेवाओं की मांग करने का अधिकार है। हमें इस तथ्य से सावधान रहना चाहिए कि शिक्षा जैसी कई आवश्यक सेवाओं में इसके दूरगामी परिणाम होंगे। एक बार जब हम यह मान लेते हैं कि नागरिकों को जीवन को प्रभावित करने वाले मामलों में डिजिटल सेवा की मांग करने का मौलिक अधिकार है, जैसे कि विवाह तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे।"

बेंच ने शफीन जहान बनाम अशोकन केएम में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया , जिसमें भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का अभिन्न अंग होने के कारण विवाह का अधिकार एक मौलिक अधिकार माना गया है। .

खंडपीठ ने कहा कि प्रौद्योगिकी में तेजी से विकास और मौजूदा महामारी जैसी अप्रत्याशित परिस्थितियों में एसएमए के तहत इस कानून को एक विकासशील कानून के रूप में मानना ​​​​चाहिए।

पीठ ने कहा, "जब हम विशेष विवाह अधिनियम के तहत कानून की व्याख्या करते हैं, तो इसे एक गतिमान कानून के रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है जो आने वाले सभी समयों पर लागू होगा। उन पार्टियों की स्थिति को समझते हुए जो शारीरिक रूप से नहीं आ पा रही हैं, मान लीजिए कि राज्य में पूरी तरह से लॉकडाउन लगा है, ऐसी स्थिति में हमें एक तकनीकी समाधान प्रदान करना होगा।"

इसने इस विश्वास की पुष्टि होगी की कि सरकार ऐसे समय में नागरिकों के हितों को पूरा करने में भी दिलचस्पी लेती है।

" सरकार तकनीकी सेवाओं को आगे बढ़ाने में बहुत सक्रिय है। लेकिन साथ ही, बायोमेट्रिक पहचान और चेहरे की पहचान जैसे कुछ अन्य मुद्दे सामने आएंगे। हमें पासपोर्ट डेटाबेस आदि साझा करने में केंद्र सरकार की सहायता की आवश्यकता होगी। आम आदमी को केवल एक आवश्यकता होगी कि वह एक ऑनलाइन आवेदन करें। हम समझते हैं कि इसमें समय लगेगा लेकिन हमें कानून बनाने की जरूरत है, जिसके लिए हमें कुछ और शोध करने की जरूरत है ।"

कोर्ट ने सोमवार को कहा था कि विभिन्न पक्षों ने ऑनलाइन विवाह पंजीकरण के लिए दो तरीके सुझाए हैं- " एक, वाणिज्य दूतावास के समक्ष पार्टियों की भौतिक उपस्थिति, यदि वे विदेश में रह रहे हैं या ऐसे प्राधिकरण के सामने हैं जिन्हें घरेलू कानून के तहत मान्यता दी जा सकती है। दूसरा तरीका चेहरे की पहचान और बायोमेट्रिक क्रेडेंशियल के संदर्भ में पार्टियों की पहचान के लिए तकनीकी उपकरण विकसित करना।"

मंगलवार को हुई सुनवाई में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के पूर्व और वर्तमान सचिव के मोहम्मद वाई सफिरुल्ला, विश्वनाथ सिन्हा और स्नेहिल कुमार सिंह अदालत के सामने पेश हुए थे। आम सहमति थी कि पुराने डेटा के रूप में कुछ तकनीकी सीमाओं को छोड़कर, ऑनलाइन दिखाई देने वाली पार्टियों की पहचान करने के लिए चेहरे की पहचान और बायोमेट्रिक क्रेडेंशियल्स का उपयोग करना संभव है।

हालांकि, यह बताया गया कि एसएमए के मौजूदा प्रावधान विवाह के ऑनलाइन पंजीकरण के कार्यान्वयन के लिए अनुकूल नहीं हैं। जबकि आईटी विभाग समाधान प्रदान करने के लिए प्रौद्योगिकी विकसित कर सकता है, यह क़ानून में समस्याओं को ठीक नहीं कर सकता है। इसलिए, यह सुझाव दिया गया था कि न्यायालय अधिनियम में ही एक अलग प्रावधान बनाने के आदेश पारित कर सकता है।

इसके अलावा, यह स्पष्ट किया गया था कि सरकार को अपने पास उपलब्ध बायोमेट्रिक और चेहरे की पहचान के आंकड़ों के साथ-साथ विवाह अधिकारियों के पास उपलब्ध बुनियादी ढांचे को अद्यतन करने के लिए संसाधन उपलब्ध कराने होंगे।

इस संबंध में, सहायक सॉलिसिटर जनरल, आर सुविन मेनन ने अदालत को सूचित किया कि वह पहले से ही वाणिज्य दूतावासों में विदेशी विवाह अधिकारियों के होने की संभावना पर विचार कर रहे हैं और क्या सरकार के पास उपलब्ध डेटा का उपयोग विवाह पंजीकरण के उद्देश्य के लिए किया जा सकता है या नहीं।

आज, कोर्ट ने राज्य के अटॉर्नी एन मनोज कुमार को इन बातचीत के आलोक में राज्य सरकार और अन्य विशेषज्ञ सार्वजनिक अधिकारियों के विचारों को रिकॉर्ड में रखने का निर्देश दिया। न्यायालय के समक्ष व्यक्तिगत मामलों के संबंध में, पीठ ने एसएमए के तहत विवाह अधिकारियों को निम्नलिखित शर्तों के अधीन ऑनलाइन विवाह करने का निर्देश दिया:

-विवाह के लिए आवश्यक गवाहों को विवाह अधिकारी के समक्ष उपस्थित होना होगा;

-गवाह उन पक्षों की पहचान करेंगे जो ऑनलाइन हैं;

-विवाह अधिकारी द्वारा पहचान के लिए ऑनलाइन उपस्थित होने वाले पक्षों के संबंध में पासपोर्ट और किसी भी अन्य सार्वजनिक दस्तावेज की प्रतियां विवाह अधिकारी को प्रदान की जाएंगी;

-जहां कहीं भी पार्टियों के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है, वे अधिकृत मुख्तारनामा या भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त किसी अन्य आधिकारिक दस्तावेज द्वारा चिपकाए जाएंगे;

-अन्य सभी आवश्यक औपचारिकताओं को विवाह के अनुष्ठापन से पहले पूरा किया जाएगा;

-विवाह अधिकारी तारीख और समय तय करेगा और पार्टियों को पहले ही बता देगा;

-विवाह अधिकारी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के मोड को ठीक करने के लिए स्वतंत्र है;

-विवाह अधिकारी को वैधानिक औपचारिकताओं के पूरा होने पर यथासंभव शीघ्रता से निर्देशों का पालन करने का निर्देश दिया जाता है;

-अनुष्ठापन पर विवाह प्रमाणपत्र एसएमए की धारा 13 में निर्दिष्ट तरीके से जारी किया जाएगा;

-अनुष्ठापन या पंजीकरण के लिए की गई कार्यवाही को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा।

मामलाः धान्या मार्टिन बनाम केरल राज्य

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