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दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी जिलों में जेजेबी की स्थापना और किशोर न्याय कोष के लिए धन के आवंटन पर राज्य सरकार से जवाब मांगा

LiveLaw News Network
28 Oct 2021 6:41 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी जिलों में जेजेबी की स्थापना और किशोर न्याय कोष के लिए धन के आवंटन पर राज्य सरकार से जवाब मांगा
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दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को किशोर न्याय कोष में अब तक वितरित की गई राशि सहित कुछ वर्षों में किशोर न्याय कोष में राशि के आवंटन पर राज्य सरकार से जवाब मांगा।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति अनूप जे भंभानी की पीठ ने शहर के सभी 11 जिलों में किशोर न्याय बोर्ड की स्थापना की समय सीमा और इसकी स्थापना के वर्तमान चरण पर भी जवाब मांगा।

न्यायालय एक आपराधिक मामले पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक किशोर न्याय बोर्ड के मुख्य मजिस्ट्रेट द्वारा कानून के प्रश्न उन परिस्थितियों से संबंधित थे जब कानून का उल्लंघन करने वाला बच्चा भी देखभाल और सुरक्षा की आवश्यकता वाला बच्चा होता है।

कोर्ट ने शुरुआत में कहा,

"किसी भी समाज को इस बात से आंका जाना चाहिए कि वह अपने बच्चों की देखभाल कैसे करता है। अगर हम अपने बच्चों की देखभाल करने में असमर्थ हैं तो भगवान हमारी मदद करें। सीसीटीवी मदद कर रहे हैं। यह न केवल एक निवारक है बल्कि एक सहायता के रूप में भी काम करता है।"

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नाबालिगों को पेश करने के मुद्दे पर भी विचार किया और ऐसे किशोरों के ऑब्जर्वेशन होम में रहने पर चिंता व्यक्त की।

जबकि कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि किशोरों को संबंधित किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पहले 24 घंटों के भीतर पेश किया जाना है, पीठ ने कहा:

"सवाल यह है कि आप डेनमार्क के राजकुमार के बिना हेमलेट का मंचन नहीं कर सकते। राजकुमार को अपनी उपस्थिति बनानी होगी। एक बार वह वहां हो तभी आप हेमलेट का मंचन कर सकते हैं। वहीं से यह शुरू होता है। आप कह रहे हैं कि वहां किशोर न्याय बोर्ड के साथ एक समस्या है। हमने अब तक जो किया है वह यह है कि 24 घंटे के भीतर पेश होना होगा, भले ही किशोर बोर्ड या अभिभावक की कस्टडी में हो या अस्थायी रूप से एक ऑब्जर्वेशन गृह में रखा गया हो। फिर दो सप्ताह के भीतर आयु से संबंधित दस्तावेजों को प्राप्त करना होगा और जेजेबी को प्रस्तुत करना होगा। फिर बोर्ड उन मामलों के अलावा दो सप्ताह के भीतर कॉल करेगा, जहां ऑसिफिकेशन टेस्ट की आवश्यकता होती है। इसे भी दो सप्ताह के भीतर किया जाना है। "

दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुई नंदिता राव ने बच्चों के लिए उपलब्ध संस्थानों की संख्या के बारे में अदालत को बताया।

उन्होंने प्रस्तुत किया कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत तीन प्रकार के घर हैं,

पहला, ऑब्जर्वेशन होम जहां कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चों को उनके मामलों के लंबित रहने के दौरान अस्थायी देखभाल दी जाती है। ऐसे घरों में ठहरने की अवधि चार महीने से अधिक नहीं होती है। दूसरा, अधिनियम के तहत आदेशित विशेष ठहराव हैं, जहां ठहरने की अवधि तीन वर्ष से अधिक नहीं हो सकती है; और तीसरा, सुरक्षा का स्थान जहां 18 वर्ष से अधिक आयु के कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चे या 16 से 18 वर्ष के बीच के बच्चों को रखा जाता है जो जघन्य अपराधों के आरोपी या दोषी हैं।

अदालत ने दिल्ली सरकार को उपरोक्त पहलुओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया और मामले को आगे की सुनवाई के लिए 14 दिसंबर को सूचीबद्ध किया।

पिछले महीने कोर्ट ने निर्देश दिया था कि बच्चों या किशोरों के खिलाफ छोटे-मोटे अपराधों का आरोप लगाने वाले सभी मामले, जहां जांच लंबित है और एक वर्ष से अधिक की अवधि के लिए अनिर्णायक है, वहां मामले को तत्काल प्रभाव से समाप्त समझा जाएगा। फिर भले ही ऐसे बच्चे या किशोर को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया हो।

कोर्ट ने कहा कि लंबे समय से लंबित मामले महामारी के कारण थे, जहां बच्चों को जेजे बोर्ड के सामने पेश नहीं किया गया था। हितधारकों द्वारा यह समझा गया कि धारा 14 में निर्धारित चार महीने का समय जेजेबी के समक्ष बच्चे की पेशी की तारीख के बाद ही चलना शुरू होगा। छोटे-मोटे अपराधों से संबंधित सैकड़ों मामले विभिन्न चरणों में काफी समय से लंबित हैं।

केस टाइटल: कोर्ट ऑन इट्स ओन मोशन बनाम स्टेट

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