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विदेशी ट्रिब्यूनल का एक व्यक्ति को नागरिक घोषित करने का आदेश उसी व्यक्ति के खिलाफ बाद की कार्यवाही पर बाध्यकारी: गुवाहाटी हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
14 Jan 2022 10:10 AM GMT
विदेशी ट्रिब्यूनल का एक व्यक्ति को नागरिक घोषित करने का आदेश उसी व्यक्ति के खिलाफ बाद की कार्यवाही पर बाध्यकारी: गुवाहाटी हाईकोर्ट
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गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सोमवार को फॉरेनर्स ट्र‌िब्यूनल के एक आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें जोरगाह गांव, सोनितपुर के निवासी को विदेशी घोषित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि संबंधित ट्रिब्यूनल ने पहले उसे भारतीय नागरिक घोषित किया था, लेकिन बाद में एक उसे विदेशी घोषित करने का एकपक्षीय आदेश पारित किया।

ज‌स्टिस कोटेश्वर सिंह और जस्टिस मलाश्री नंदी की खंडपीठ ने एकपक्षीय आदेश को रद्द कर दिया और मामले को संबंधित फॉरेनर्स ट्र‌िब्यूनल को वापस भेज दिया। तदनुसार, ट्रिब्यूनल को पहले यह निर्धारित करने का निर्देश दिया गया था कि क्या याचिकाकर्ता वही व्यक्ति है जिसे पहले भारतीय नागरिक घोषित किया गया था।

कोर्ट ने कहा,

"तदनुसार, यह प्रारंभिक मुद्दा होगा, जिसे एफटी (डी) केस नंबर 3512/2012 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल प्रथम तेजपुर द्वारा तय किया जाना है कि क्या वर्तमान कार्यवाही में शामिल व्य‌क्ति वही व्यक्ति है, जिसे एफटी (डी) केस नंबर 8312/2012 फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल तेजपुर (प्रथम), सोनितपुर द्वारा पहले भारतीय नागरिक घोषित किया गया था और यदि यह पाया जाता है कि याचिकाकर्ता वही व्यक्ति है जिस पर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल तेजपुर (प्रथम), सोनितपुर, द्वारा एफटी (डी) केस नंबर 8312/2012

में कार्यवाही की गई थी तो 31.08.2017 को एफ.टी.(डी) केस नंबर 8312/2012 में पारित आदेश के आधार पर वर्तमान कार्यवाही तुरंत याचिकाकर्ता के पक्ष में समाप्त की जाएगी, जहां याचिकाकर्ता को भारतीय नागरिक घोषित किया गया। यदि, हालांकि, निर्णय अन्यथा है, तो याचिकाकर्ता इस राय के साथ-साथ अन्य निष्कर्षों को फिर से इस न्यायालय से संपर्क करके चुनौती देने के लिए स्वतंत्र होगा।"

पृष्ठभूमि

मौजूदा मामले में मोहम्मद मयुनुल @ मोइनुल हक ने विदेशी ट्रिब्यूनल, तेजपुर नंबर 1, असम के 31 दिसंबर, 2020 के आदेश के खिलाफ मौजूदा याचिका दायर की थी, जिसमें उन्हें 1971 के बाद का विदेशी घोषित किया गया था।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत को अवगत कराया कि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल तेजपुर 1, सोनितपुर ने 31 अगस्त, 2017 के आदेश में कहा था कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में सक्षम था कि वह विदेशी नहीं बल्कि भारतीय है।

तदनुसार, राज्य के खिलाफ और याचिकाकर्ता के पक्ष में संदर्भ का उत्तर नकारात्मक में दिया गया था। हालांकि, फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल तेजपुर नंबर 1, असम ने बाद की कार्यवाही में यानी एफटी (डी) केस नंबर 3512/2012 में 31 दिसंबर, 2020 के आदेश के तहत यह विचार किया था कि याचिकाकर्ता ने न तो अपना प्रतिनिधित्व प्रस्तुत किया था और न ही अपने इस दावे के समर्थन में सबूत पेश किए कि वह एक भारतीय नागरिक है और तदनुसार यह साबित करने में विफल रहा कि वह एक भारतीय नागरिक है।

अदालत को आगे बताया गया कि हालांकि याचिकाकर्ता नोटिस मिलने के बाद ट्रिब्यूनल के सामने पेश हुआ था, लेकिन याचिकाकर्ता के कई मौकों पर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल, तेजपुर नंबर 1 के सामने पेश होने में असमर्थता का कारण चल रही COVID महामारी थी। तद्नुसार, यह प्रार्थना की गई कि 31 दिसंबर, 2020 के आक्षेपित आदेश को विशेष रूप से उसी ट्रिब्यूनल द्वारा 31 अगस्त, 2017 के आदेश द्वारा पेश की गई पूर्व राय के आलोक में मामले को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को रिमांड करके रद्द किया जाए।

यह आगे तर्क दिया गया था कि चूंकि दोनों कार्यवाही में कार्यवाहीकर्ता/याचिकाकर्ता के नाम और विवरण में समानता है, विदेशी न्यायाधिकरण के समक्ष एफटी (डी) केस संख्या 3512/2012, 31 दिसंबर, 2020 के संबंध में दूसरी कार्यवाही , तेजपुर (प्रथम), असम, अब्दुल कुड्डस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर टिकाऊ नहीं है, क्योंकि रिस जूडिकाटा का सिद्धांत बाद की कार्यवाही के लिए लागू होगा।

टिप्पणियां

शिकायत का संज्ञान लेते हुए, कोर्ट ने कहा कि अब्दुल कुड्डस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अगर विदेशी ट्रिब्यूनल द्वारा नागरिकता का निर्धारण करने वाले व्यक्ति के पक्ष में कोई आदेश दिया गया था तो उक्त निर्णय एक ही व्यक्ति के खिलाफ बाद की कार्यवाही पर बाध्यकारी होगा और रिस जूडिकाटा के सिद्धांत को लागू करके व्यक्ति की नागरिकता को फिर से निर्धारित करने के लिए कोई अन्य कार्यवाही नहीं हो सकती है।

पीठ ने कहा, "मौजूदा मामले में, चूंकि इस पहलू पर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा विचार नहीं किया जा सकता था क्योंकि यह एक पक्षीय निर्णय लिया गया था, हमारा यह भी विचार है कि 2017 अब्दुल कुद्दुस (सुप्रा) में निर्णय के आलोक में 31.08.2018 को पहले की राय को ध्यान में रखते हुए मामले को ट्रिब्यूनल द्वारा नए सिरे से तय करने की आवश्यकता है।"

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि केवल जब ट्रिब्यूनल को यह पता चलता है कि वर्तमान कार्यवाही में शामिल व्य‌क्ति, वही व्यक्ति नहीं है जिस पर कार्यवाही की गई थी और एफटी (डी) केस नंबर 8312/2012 में भारतीय पाया गया था, तो विवादित आदेश को पुनर्जीवित किया जाएगा। और ट्रिब्यूनल के आदेश को याचिकाकर्ता की पहचान और इस याचिका में उठाए गए अन्य आधारों के मुद्दे पर याचिकाकर्ता द्वारा चुनौती दी जा सकती है।

हालांकि, कोर्ट ने आदेश दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता की राष्ट्रीयता पहले से ही विवादित है, इसलिए ट्रिब्यूनल के समक्ष कार्यवाही के लंबित रहने तक वह जमानत पर रहेगा।

केस शीर्षक: मोहम्मद मयुनुल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया

केस उद्धरण: 2022 लाइव लॉ (Gau) 2.

आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

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