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"किसी से कोई सम्मान/अभिनंदन स्वीकार न करें": हरियाणा कोर्ट ने राम भगत गोपाल को जमानत देते हुए शर्त लगाई

LiveLaw News Network
3 Aug 2021 11:14 AM GMT
किसी से कोई सम्मान/अभिनंदन स्वीकार न करें: हरियाणा कोर्ट ने राम भगत गोपाल को जमानत देते हुए शर्त लगाई
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हरियाणा की एक अदालत ने गुरुग्राम के पटौदी में कथित रूप से सांप्रदायिक भाषण देने के आरोप में दर्ज एक मामले में रामभगत गोपाल को जमानत देते हुए एक शर्त लगाई कि वह किसी भी व्यक्ति या समूह या समाज आदि से व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप से किसी भी सम्मान या अभिनंदन को स्वीकार नहीं करेगा।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, गुरुग्राम डॉ डीएन भारद्वाज ने जोर देकर कहा कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को बोलने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है लेकिन यह स्वतंत्रता बेलगाम नहीं है।

कोर्ट ने कहा, " अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी उचित प्रतिबंध हैं। इसी प्रकार, जीवन की स्वतंत्रता और किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान द्वारा समान रूप से महत्वपूर्ण और गारंटीकृत है, लेकिन आपराधिक न्यायशास्त्र के मौलिक सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए सामाजिक हितों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच के संतुलन को बनाए रखना है।"

रामभगत गोपाल को जमानत देते हुए अदालत ने ध्यान दिया कि वह 12.7.2021 से हिरासत में है और उसकी उम्र लगभग 19 साल है और उसे किसी भी रिकवरी आदि की आवश्यकता नहीं है और उस मुकदमे में काफी समय लगने की संभावना है।

उसे किसी भी ऐसी ‌सार्वजनिक सभा के आयोजन या भाग लेने या संबोधित करने से रोका गया है, जिनसे धार्मिक/ नस्लीय समूहों/ समुदाय के बीच वैमनस्य या शत्रुता, घृणा या द्वेष की भावना को बढ़ावा देने की संभावना है या ऐसी सभा में शामिल होने से रोका गया है, जो धार्मिक सद्भाव के लिए प्रतिकूल है या उनसे सार्वजनिक शांति भंग करने या किसी धार्मिक समूह/समुदाय के सदस्यों के बीच भय या असुरक्षा की भावना पैदा करने या किसी धार्मिक समूह/समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की संभावना है।

पृष्ठभूमि

गोपाल को पटौदी की एक महापंचायत में कथित रूप से भड़काऊ टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जिसमें उसने कथित रूप से लोगों को मुस्लिम लड़कियों का अपहरण करने और मुस्लिम समुदाय के लोगों को मारने के लिए उकसाया था।

इसके बाद गोपाल शर्मा उर्फ ​​रामभगत गोपाल के खिलाफ पटौदी पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 53ए (धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 295ए (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का दुर्भावनापूर्ण इरादा) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले न्यायिक दंडाधिकारी मोहम्मद सगीर ने उसे इस मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया था ।

प्राथमिकी की सामग्री और उपलब्ध वीडियो रिकॉर्डिंग को देखते हुए, अदालत ने कहा था कि यह स्पष्ट है कि वहां एक सभा मौजूद थी, जहां आरोपी गोपाल शर्मा ने नफरत भरी भाषा का इस्तेमाल किया और धर्म के नाम पर भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल करके लोगों को मारने के लिए नारे लगाए।

कोर्ट ने कहा था, "अभ‌ियुक्त का कार्य यानि हेट स्पीच, लड़कियों और एक विशेष धार्मिक समुदाय के व्यक्तियों के अपहरण और हत्या के लिए लोगों को भड़काना अपने आप में हिंसा का एक रूप है और ऐसे लोग और उनके भड़काऊ भाषण एक सच्ची लोकतांत्रिक भावना के विकास में बाधा हैं।"

जमानत से इनकार करते हुए कोर्ट ने कहा था कि धर्म या जाति के आधार पर शांतिपूर्ण समाज को बांटने वाले जघन्य अपराध के बावजूद उसे जमानत देना विभाजनकारी ताकतों को गलत संदेश देगा।

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