UAPA आतंकी साज़िश मामले में दो आरोपियों को मिली ज़मानत, हाईकोर्ट ने 4 साल से ज़्यादा जेल में रहने और सीमित भूमिका का हवाला दिया

Shahadat

20 March 2026 2:38 PM IST

  • UAPA आतंकी साज़िश मामले में दो आरोपियों को मिली ज़मानत, हाईकोर्ट ने 4 साल से ज़्यादा जेल में रहने और सीमित भूमिका का हवाला दिया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) द्वारा जांच किए जा रहे एक आतंकी साज़िश मामले में दो आरोपियों को ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि चार साल से ज़्यादा समय तक जेल में रहना और मामले में उनकी सीमित भूमिका को देखते हुए ट्रायल के दौरान उन्हें कुछ शर्तों के साथ रिहा करना सही है।

    जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने हारिस निसार लांगू और ज़ामिन आदिल भट की अपील मंज़ूर कर ली। इन दोनों ने स्पेशल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उनकी ज़मानत अर्ज़ियां खारिज कर दी गईं।

    यह मामला 2021 में NIA द्वारा दर्ज की गई FIR से जुड़ा है। FIR में आरोप लगाया गया कि प्रतिबंधित आतंकी संगठनों और उनके कथित ओवर-ग्राउंड वर्करों के बीच एक बड़ी साज़िश रची गई।

    सरकारी वकील के मुताबिक, यह मामला एक ऐसी साज़िश से जुड़ा है, जिसे कथित तौर पर लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और ऐसे ही दूसरे प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े हैंडलरों ने रचा था। इस साज़िश का मकसद जम्मू-कश्मीर और भारत के दूसरे हिस्सों में आतंकी गतिविधियां करना था।

    आरोपियों पर ऑनलाइन प्रोपेगैंडा में हिस्सा लेने, कुछ सोशल-मीडिया ग्रुप्स का मेबर होने और कथित तौर पर कट्टरपंथी सामग्री शेयर करने का आरोप था।

    उन्हें ज़मानत देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि आरोपियों ने कथित तौर पर ऐसे कोई ग्रुप बनाए थे या उनमें कोई आपत्तिजनक सामग्री शेयर की थी।

    कोर्ट ने कहा,

    "इस अपील के मकसद से इतना कहना ही काफी है कि आरोपी, जेल में बिताए लंबे समय और सरकारी वकील द्वारा उन पर लगाए गए आरोपों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'गुलफिशा फातिमा' (उपरोक्त) मामले में ज़मानत पर रिहाई के लिए तय किए गए मापदंडों को पूरा करने में सफल रहे हैं।"

    इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के डिजिटल उपकरणों पर मिली सामग्री, भले ही वह राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाली हो, ट्रायल के इस चरण में उनकी लंबे समय तक हिरासत जारी रखने का कोई ठोस आधार नहीं बनती।

    कोर्ट ने आगे कहा कि वैचारिक जुड़ाव और ऑपरेशनल भागीदारी के बीच का अंतर संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण है। UAPA की धारा 43D(5) के तहत 'प्रथम दृष्टया' (Prima Facie) के मानक को लागू करते समय आरोपियों में से हर एक से जुड़े विशिष्ट तथ्यों और सामग्री को ध्यान में रखना ज़रूरी है।

    अदालत ने कहा,

    “इसलिए हमारा यह मानना ​​है कि अपीलकर्ता(ओं) पर लगे आरोपों को ध्यान में रखते हुए उनकी लगातार हिरासत भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके अधिकार का उल्लंघन हो सकती है। अपीलकर्ता(ओं) ने पहले ही लगभग 4 साल और 4 महीने की लंबी कैद काट ली है। फिर इस बात की कोई निश्चितता नहीं है कि मुकदमा उचित समय के भीतर पूरा हो जाएगा। हमारी सुविचारित राय में और अपीलकर्ता(ओं) को सौंपी गई भूमिका को देखते हुए इस चरण पर अपीलकर्ता(ओं) की लगातार हिरासत न्याय के उद्देश्यों को पूरा नहीं करेगी।”

    लांगू की स्वास्थ्य स्थिति के संबंध में— जिनके बारे में कहा गया कि वे सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस से पीड़ित हैं— अदालत ने टिप्पणी की कि यद्यपि वह UAPA की धारा 43D(5) के तहत आने वाले मामलों में मेडिकल आधारों को स्वतंत्र रूप से निर्णायक नहीं मानती है, फिर भी एक विचाराधीन कैदी की स्वास्थ्य स्थिति भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकारों के समग्र मूल्यांकन में एक प्रासंगिक विचार है।

    जजों ने कहा,

    “किसी ऐसे व्यक्ति की मुकदमे से पहले की लंबी हिरासत, जिसकी कथित भूमिका मुख्य रूप से डिजिटल और अहिंसक प्रकृति की है, और जो इसके अतिरिक्त एक प्रमाणित बीमारी से भी पीड़ित है, तो यह स्थिति लगातार कैद के बजाय सशर्त रिहाई के पक्ष में पलड़ा और भारी कर देती है।”

    Title: HARIS NISAR LANGOO v. NIA and ZAMIN ADIL BHAT v. NIA

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