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केवल गलत आदेश पारित करने के लिए किसी लोक सेवक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती, जब कि यह सबूत ना हो कि आदेश बाहरी विचारों से प्रभावित है: केरल हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
11 Jun 2021 5:43 AM GMT
केवल गलत आदेश पारित करने के लिए किसी लोक सेवक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती, जब कि यह सबूत ना हो कि आदेश बाहरी विचारों से प्रभावित है: केरल हाईकोर्ट
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केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैसला में कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी लोक सेवक के खिलाफ केवल एक गलत आदेश पारित करने के कारण, जब कि यह प्रदर्शित करने के लिए कि आदेश को बाहरी विचारों या परोक्ष उद्देश्यों के तहत जानबूझकर पारित किया गया था, कोई सामग्री मौजूद ना हो, आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती है।

हाईकोर्ट ने यह फैसला उडुंबंचोला के तत्कालीन तहसीलदार पी.सुनील कुमार की ओर से दायर याचिका पर दिया, जिन्होंने सरकार के प्रतिकूल एक आदेश पारित करने के मामले में उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की थी। उक्त प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता आदेश पारित करने में बाहरी विचारों से प्रेरित था।

न्यायालय के समक्ष प्रश्न था कि क्या एक लोक सेवक, जो किसी कानून के तहत अर्ध न्यायिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है, को अधिनियम के तहत गलत आदेश पारित करने के लिए आपराधिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।

जस्टिस आर. नारायण पिशारदी ने याचिका की अनुमति देते हुए कहा कि लोक सेवक की ओर से बेईमान इरादे को किसी पक्ष के अर्ध न्यायिक आदेश पारित करने का कारण नहीं माना जा सकता है। अधिकारी के ‌खिलाफ कार्यवाही करने के लिए संतोषजनक सामग्री होनी चाहिए।

वास्तव में, धारा 13(1)(डी)(ii) के अवलोकन से पता चलता है कि एक लोक सेवक पर तभी मुकदमा चलाया जा सकता है जब उसने अपने पद का दुरुपयोग किया हो और कोई मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ प्राप्त किया हो।

हालांकि, वर्तमान मामले में, यह आरोप बिल्कुल भी नहीं था कि याचिकाकर्ता ने बाहरी विचारों के कारण जानबूझकर कदाचार किया, और 6 साल की लंबी जांच में इस प्रकार के कृत्य का खुलासा करने लिए किसी भी प्रकार की सामग्री की खोज नहीं हो सकी।

उस नोट पर, यह देखा गया कि "अर्ध न्यायिक प्राधिकरण द्वारा की गई प्रत्येक त्रुटि, चाहे वह कितनी भी बड़ी हो, को अनुचित उद्देश्यों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।"

इसके अलावा, यदि याचिकाकर्ता ने गलत आदेश पारित किया है, तो इसे आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के बजाय अपीलीय या पुनरीक्षण फोरमों द्वारा ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार के फोरमों को बनाने का मूल उद्देश्य यही था कि लोगों के निर्णय गलत हो सकते हैं।

तथ्यों के एक समूह की अलग निष्कर्ष पर पहुंचने की संभावना एक लोक सेवक को कदाचार के लिए आरोपित करने का आधार नहीं है। यदि इसे प्रोत्साहित किया जाता है, तो अधिकारी को सरकार के प्रतिकूल आदेश पारित करने का लगातार डर रहेगा, और स्वतंत्र रूप से कार्य करने में सक्षम नहीं होगा। इसलिए, न्यायिक शक्ति के गलत प्रयोग को आपराधिक कदाचार नहीं माना जाएगा।

उपरोक्त पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, यह माना गया कि केवल इसलिए कि आदेश गलत है, यह लोक सेवक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का आधार नहीं हो सकता है, जब तक कि वह बाहरी विचारों या परोक्ष उद्देश्यों से प्रेरित नहीं था। अर्ध न्यायिक प्राधिकरण द्वारा की गई त्रुटियों के लिए उपचार अपील या संशोधन के फोरम हैं, जिन्हें उस उद्देश्य के लिए कानून के तहत प्रदान किया गया है।"

इसलिए, भले ही याचिकाकर्ता ने पिछले रिकॉर्ड को देखे बिना या मामले की तथ्यात्मक स्थिति का ठीक से पता लगाए बिना कथित आदेश पारित किया हो, उसका कार्य पीसी एक्‍ट की धारा 13 (1) (डी) (ii) के तहत अपराध को आकर्षित नहीं करता है।

एक तहसीलदार केरल भूमि संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत आदेश पारित करते समय अर्ध न्यायिक प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है

फैसले में न्यायालय ने एक अर्ध न्यायिक आदेश और एक प्रशासनिक या मंत्रिस्तरीय आदेश के बीच के अंतर पर भी चर्चा की। यह पाया गया कि यदि किसी वैधानिक प्राधिकरण के पास कोई ऐसा कार्य करने की शक्ति है, जो विषय पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, तो उस प्राधिकरण का अंतिम निर्धारण एक अर्ध-न्यायिक कृत्य है।

इसके अलावा न्यायालय ने कहा, "जब कानून की आवश्यकता होती है कि निर्णय पर पहुंचने से पहले एक प्राधिकरण को जांच करनी चाहिए, तो कानून की ऐसी आवश्यकता प्राधिकरण को एक अर्ध न्यायिक प्राधिकरण बनाती है। एक अन्य परीक्षण जो प्रशासनिक कार्य को अर्ध न्यायिक कार्य से अलग करता है, वह यह है कि जो प्राधिकरण अर्ध न्यायिक रूप से कार्य करता है, उसे नियमों के अनुसार कार्य करने की आवश्यकता होती है, जबकि प्राधिकरण जो प्रशासनिक रूप से कार्य करता है वह नीति और समीचीनता द्वारा निर्धारित होता है।"

उक्त अधिनियम के तहत आदेश पारित करने से पहले एक जांच पर विचार किया जाता है। तहसीलदार को मामले में निर्णय लेने में न्यायिक रूप से कार्य करना होता है। इसलिए, याचिकाकर्ता वर्तमान मामले में एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी है।

प्राथमिकी जांच शुरू होने से पहले संज्ञेय अपराध होने का खुलासा होना चाहिए

पुलिस केवल तभी जांच कर सकती है, जब उनके पास किसी मामले में संज्ञेय अपराध के होने का संदेह करने के लिए पर्याप्त कारण हों, और इस तरह के अपराध का प्रथम दृष्टया प्राथमिकी में खुलासा किया जाना चाहिए। बेशक, अगर यह शर्त पूरी होती है तो अदालत को जांच रोकने की कोई शक्ति नहीं है।

हालांकि, अगर प्राथमिकी में इस तरह के अपराध का खुलासा नहीं होता है तो अदालत का जांच को रद्द करना उचित है। किसी निर्दोष व्यक्ति को जांच की प्रक्रिया के जर‌िए प्रताड़ित करना तर्कसंगत नहीं है। वर्तमान मामले में, कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी में याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी अपराध का खुलासा नहीं किया गया है। नतीजतन, एकल पीठ ने याचिका की अनुमति देते हुए प्राथमिकी रद्द कर दी।

आदेश डाउनलोड करने/पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें



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